पंचानां पापानां हिंसादीनां मनोवचकायैः। कृतकारितानुमोदैस्त्यागस्तु महाव्रतं महताम्॥72॥
(रत्नकरंड श्रावकाचार)
अर्थ: हिंसादिक पाँचों पापों का मन, वचन, काय तथा कृत, कारित, अनुमोदना से त्याग करना महापुरुषों (मुनियों) का महाव्रत है।॥72॥
तत्र हिंसानृतस्तेयाब्रह्मकृत्स्नपरिग्रहात्। देशतो विरतिः प्रोक्ता गृहस्थानामणुव्रतम्॥720॥
सर्वतो विरतिस्तेषां हिंसादीनां व्रतं महत्। नैतत्सागारिभिः कर्तुं शक्यते लिंगमर्हताम्॥721॥ (पंचाध्यायी / उत्तरार्ध)
सर्वतो विरतिस्तेषां हिंसादीनां व्रतं महत्। नैतत्सागारिभिः कर्तुं शक्यते लिंगमर्हताम्॥721॥ (पंचाध्यायी / उत्तरार्ध)
अर्थ: हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और संपूर्ण परिग्रह से एक देश (आंशिक) विरक्त होना गृहस्थों का अणुव्रत कहा गया है।॥720॥
उन्हीं हिंसादिक पाँच पापों का सर्वदेश (पूर्ण रूप) से त्याग करना महाव्रत कहलाता है। यह जिनरूप मुनिलिंग गृहस्थों के द्वारा नहीं पाला जा सकता।॥721॥
उन्हीं हिंसादिक पाँच पापों का सर्वदेश (पूर्ण रूप) से त्याग करना महाव्रत कहलाता है। यह जिनरूप मुनिलिंग गृहस्थों के द्वारा नहीं पाला जा सकता।॥721॥
साधेंति जं महत्थं आयरिइदा य जं महल्लेहिं। जं च महल्लाइं सयं हव्वदाइं हवे ताइं॥1184॥
(भगवती आराधना / 1184 / 1170)
अर्थ: जो महान् मोक्षरूप अर्थ की सिद्धि करते हैं, महान् तीर्थंकरादि पुरुषों ने जिनका आचरण किया है, और जो सब पापयोगों का त्याग होने से स्वतः महान् हैं, इसलिए इनका नाम 'महाव्रत' है।॥1184॥