जैनामृत गुणस्थान शिविर Day-2 रामपुर मनिहारन, (सहारनपुर )

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03 Nov 2026 Admin

गुणस्थान – अध्ययन एवं पुनरावृत्ति

द्वितीय दिवस – अध्ययन सामग्री

मोहनीय कर्म एवं योग का परिचय

सानिध्य : आचार्य गुरुदेव श्री भारत भूषण जी मुनिराज

भाग 1 – पिछले पाठ की पुनरावृत्ति

1. गुणस्थान का शाब्दिक अर्थ

गुण का अर्थ – परिणाम या भाव।

स्थान का अर्थ – जगह या अवस्था।

जीव के जैसे भाव या परिणाम होते हैं, उसी के अनुसार उसकी अवस्था होती है। इसी को गुणस्थान के अर्थ से समझते हैं।

2. गुणस्थान की संख्या

कुल गुणस्थान – 14

3. गुणस्थान की परिभाषा

परिभाषा: मोह और योग के निमित्त से जीव के अंतरंग परिणामों में प्रतिक्षण होने वाले उतार-चढ़ाव का नाम गुणस्थान है।

याद रखें – गुणस्थान की परिभाषा में मोह और योग दोनों का उल्लेख आता है।

भाग 2 – गुणस्थान के प्रमुख निमित्त

अब प्रश्न उठता है कि जीव के परिणामों में उतार-चढ़ाव किस कारण से होता है? गुणस्थान की रचना के प्रमुख निमित्त कौन-कौन से हैं?

मोहनीय कर्म + योग = गुणस्थान के प्रमुख निमित्त

मोहनीय कर्म और योग के निमित्त से जीव के अंतरंग परिणामों में प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। परिणामों के इसी उतार-चढ़ाव को गुणस्थान की परिभाषा में बताया गया है।

उदाहरण से समझिए – तापमान में उतार-चढ़ाव

जैसे किसी व्यक्ति का तापमान कभी बढ़ता है और कभी कम होता है। इसी प्रकार गुणस्थान के अध्ययन में जीव के परिणामों में होने वाले उतार-चढ़ाव को समझाया जाता है।

उदाहरण से समझिए – सोने और चाँदी के भाव

जैसे बाजार में सोने और चाँदी के भाव कभी ऊपर जाते हैं और कभी नीचे आते हैं। इसी प्रकार यहाँ आत्मा के परिणामों में होने वाले उतार-चढ़ाव को उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं।

मुख्य बात: ये उदाहरण केवल उतार-चढ़ाव की प्रक्रिया समझाने के लिए हैं। आत्मा के परिणामों का परिवर्तन आध्यात्मिक विषय है।

भाग 3 – मोहनीय कर्म का परिचय

1. मोहनीय कर्म किसे कहते हैं?

परिभाषा

जो कर्म जीव के सम्यक्त्व और चारित्र को भ्रमित करता है, उसे मोहनीय कर्म कहते हैं।

मोहनीय कर्म जीव के सम्यक्त्व और चारित्र गुणों को प्रभावित करता है। यह जीव के यथार्थ श्रद्धान और आचरण में बाधा उत्पन्न करता है।

2. मोहनीय कर्म के कितने भेद हैं?

मोहनीय कर्म के दो भेद बताए गए हैं।
  1. दर्शन-मोहनीय कर्म
  2. चारित्र-मोहनीय कर्म

3. दर्शन-मोहनीय कर्म

दर्शन-मोहनीय कर्म जीव के सम्यक्त्व को प्रभावित करता है।

नाम से ही समझिए – दर्शन-मोहनीय का संबंध सम्यक दर्शन से है।

4. चारित्र-मोहनीय कर्म

चारित्र-मोहनीय कर्म जीव के सम्यक चारित्र को प्रभावित करता है।

नाम से ही समझिए – चारित्र-मोहनीय का संबंध सम्यक चारित्र से है।

दर्शन-मोहनीय → सम्यक्त्व
चारित्र-मोहनीय → सम्यक चारित्र

भाग 4 – योग का परिचय

1. योग किसे कहते हैं?

परिभाषा

मन, वचन और काय के परिस्पंदन अर्थात् चंचलता को योग कहते हैं।

मन से हम विचार करते हैं, वचन से बोलते हैं और काय अर्थात् शरीर से क्रियाएँ करते हैं। मन, वचन और काय की प्रवृत्ति को योग के माध्यम से समझाया जाता है।

2. योग के कितने भेद हैं?

योग के तीन भेद हैं।
  1. मनयोग – मन का परिस्पंदन।
  2. वचनयोग – वचन का परिस्पंदन।
  3. काययोग – काय अर्थात् शरीर का परिस्पंदन।
मनयोग + वचनयोग + काययोग = तीन योग

भाग 5 – गुणस्थान में मोहनीय कर्म और योग की भूमिका

गुणस्थान के अध्ययन में मोहनीय कर्म और योग दोनों का विशेष महत्व बताया गया है।

मोहनीय कर्म की भूमिका

मोहनीय कर्म जीव के सम्यक्त्व और चारित्र को प्रभावित करता है।

इसके दो भेद हैं – दर्शन-मोहनीय और चारित्र-मोहनीय।

योग की भूमिका

योग मन, वचन और काय के परिस्पंदन को बताता है।

इसके तीन भेद हैं – मनयोग, वचनयोग और काययोग।

मुख्य सूत्र

मोहनीय कर्म और योग के निमित्त से जीव के अंतरंग परिणामों में उतार-चढ़ाव होता है। इसी को गुणस्थान की परिभाषा में बताया गया है।

भाग 6 – आज के अध्ययन का सार

एक नजर में पूरा पाठ

  1. गुण का अर्थ – परिणाम या भाव।
  2. स्थान का अर्थ – जगह या अवस्था।
  3. कुल गुणस्थान – चौदह।
  4. गुणस्थान की परिभाषा में मोह और योग दोनों निमित्त हैं।
  5. मोहनीय कर्म जीव के सम्यक्त्व और चारित्र को भ्रमित करता है।
  6. मोहनीय कर्म के दो भेद – दर्शन-मोहनीय और चारित्र-मोहनीय।
  7. दर्शन-मोहनीय कर्म सम्यक्त्व को प्रभावित करता है।
  8. चारित्र-मोहनीय कर्म सम्यक चारित्र को प्रभावित करता है।
  9. योग मन, वचन और काय के परिस्पंदन को कहते हैं।
  10. योग के तीन भेद – मनयोग, वचनयोग और काययोग।
याद रखने योग्य सूत्र:
मोहनीय कर्म – दो भेद।
योग – तीन भेद।
गुणस्थान – चौदह।

भाग 7 – अभ्यास के लिए 30 महत्वपूर्ण प्रश्न

आज पढ़ाए गए तीनों पाठों पर आधारित प्रश्न दिए गए हैं। प्रत्येक प्रश्न के तीन विकल्प हैं। सही विकल्प का चयन स्वयं कीजिए।

प्रश्न 1. गुण का क्या अर्थ होता है?
A. शरीर
B. परिणाम या भाव
C. धन
प्रश्न 2. स्थान का क्या अर्थ होता है?
A. जगह या अवस्था
B. केवल भाव
C. कर्म
प्रश्न 3. कुल कितने गुणस्थान होते हैं?
A. 12
B. 16
C. 14
प्रश्न 4. गुणस्थान की परिभाषा में किन दो निमित्तों का उल्लेख है?
A. राग और द्वेष
B. मोह और योग
C. सुख और दुःख
प्रश्न 5. गुणस्थान किसके परिणामों से संबंधित है?
A. जीव के अंतरंग परिणामों से
B. केवल शरीर से
C. केवल उम्र से
प्रश्न 6. गुणस्थान की परिभाषा में परिणामों में क्या होता है?
A. कोई परिवर्तन नहीं
B. केवल वृद्धि
C. प्रतिक्षण उतार-चढ़ाव
प्रश्न 7. जो कर्म जीव के सम्यक्त्व और चारित्र को भ्रमित करता है, उसे क्या कहते हैं?
A. आयु कर्म
B. मोहनीय कर्म
C. नाम कर्म
प्रश्न 8. मोहनीय कर्म किसे प्रभावित करता है?
A. सम्यक्त्व और चारित्र को
B. केवल शरीर को
C. केवल आयु को
प्रश्न 9. मोहनीय कर्म के कितने भेद हैं?
A. तीन
B. चार
C. दो
प्रश्न 10. मोहनीय कर्म का पहला भेद कौन-सा है?
A. चारित्र-मोहनीय
B. दर्शन-मोहनीय
C. मन-मोहनीय
प्रश्न 11. मोहनीय कर्म का दूसरा भेद कौन-सा है?
A. चारित्र-मोहनीय
B. वचन-मोहनीय
C. काय-मोहनीय
प्रश्न 12. दर्शन-मोहनीय कर्म किसे प्रभावित करता है?
A. सम्यक चारित्र को
B. शरीर को
C. सम्यक्त्व को
प्रश्न 13. चारित्र-मोहनीय कर्म किसे प्रभावित करता है?
A. सम्यक्त्व को
B. सम्यक चारित्र को
C. आयु को
प्रश्न 14. दर्शन-मोहनीय का संबंध किससे है?
A. सम्यक दर्शन से
B. शरीर से
C. वचन से
प्रश्न 15. चारित्र-मोहनीय का संबंध किससे है?
A. आयु से
B. सम्यक दर्शन से
C. सम्यक चारित्र से
प्रश्न 16. योग किससे संबंधित है?
A. केवल शरीर से
B. मन, वचन और काय से
C. केवल धन से
प्रश्न 17. मन, वचन और काय के परिस्पंदन को क्या कहते हैं?
A. योग
B. मोहनीय कर्म
C. सम्यक्त्व
प्रश्न 18. योग के कितने भेद हैं?
A. दो
B. चार
C. तीन
प्रश्न 19. योग का पहला भेद कौन-सा है?
A. काययोग
B. मनयोग
C. वचनयोग
प्रश्न 20. योग का दूसरा भेद कौन-सा है?
A. वचनयोग
B. मनयोग
C. दर्शनयोग
प्रश्न 21. योग का तीसरा भेद कौन-सा है?
A. मनयोग
B. वचनयोग
C. काययोग
प्रश्न 22. मन के परिस्पंदन को क्या कहते हैं?
A. मनयोग
B. वचनयोग
C. काययोग
प्रश्न 23. वचन के परिस्पंदन को क्या कहते हैं?
A. काययोग
B. वचनयोग
C. मनयोग
प्रश्न 24. काय अर्थात् शरीर के परिस्पंदन को क्या कहते हैं?
A. मनयोग
B. वचनयोग
C. काययोग
प्रश्न 25. गुणस्थान की परिभाषा में मुख्य रूप से किनका निमित्त बताया गया है?
A. मोहनीय कर्म और योग
B. केवल शरीर
C. केवल आयु कर्म
प्रश्न 26. मोहनीय कर्म के कितने भेद बताए गए हैं?
A. पाँच
B. दो
C. तीन
प्रश्न 27. योग के तीन भेदों का सही समूह कौन-सा है?
A. दर्शन, चारित्र और सम्यक्त्व
B. राग, द्वेष और मोह
C. मनयोग, वचनयोग और काययोग
प्रश्न 28. मोहनीय कर्म के दो भेदों का सही समूह कौन-सा है?
A. मनयोग और वचनयोग
B. दर्शन-मोहनीय और चारित्र-मोहनीय
C. मनयोग और काययोग
प्रश्न 29. गुणस्थान की परिभाषा में उतार-चढ़ाव किसमें होता है?
A. जीव के अंतरंग परिणामों में
B. केवल शरीर के आकार में
C. केवल उम्र में
प्रश्न 30. आज के पाठ के अनुसार सही कथन कौन-सा है?
A. मोहनीय कर्म के तीन और योग के दो भेद हैं
B. मोहनीय कर्म और योग दोनों एक ही हैं
C. मोहनीय कर्म के दो और योग के तीन भेद हैं

विद्यार्थियों के लिए विशेष निर्देश

1. गुणस्थान की परिभाषा दस बार पढ़ें और याद करें।

2. मोहनीय कर्म की परिभाषा याद करें।

3. मोहनीय कर्म के दोनों भेद याद करें।

4. दर्शन-मोहनीय और चारित्र-मोहनीय का अंतर समझें।

5. योग की परिभाषा याद करें।

6. मनयोग, वचनयोग और काययोग के अर्थ समझें।

7. आज के सभी 30 प्रश्नों का अभ्यास स्वयं करें।

अगली परीक्षा – 30 प्रश्नों के अभ्यास पर आधारित।

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