Gunsthaan

04 Nov 2026 Admin
१४ गुणस्थान विशेषांक - जैन सिद्धान्त तत्त्व ज्ञान

१४ गुणस्थान एवं सिद्ध दशा विशेषांक

आगम ग्रन्थों (गोम्मटसार, धवला, तत्त्वार्थवार्तिक) के आधार पर गुणस्थानों का समग्र, प्रामाणिक एवं विस्तृत तत्त्व-विवेचन

गुणस्थान किसे कहते हैं?
आगम लक्षण: दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय आदि कर्मों के उदय, उपशम, क्षय और क्षयोपशम आदि अवस्थाओं के होने पर आत्मा में उत्पन्न होने वाले जिन परिणामों से युक्त जो जीव देखे जाते हैं, सर्वदर्शियों (सर्वज्ञ देव) ने जीवों के उन परिणामों की तारतम्य-रूप अवस्था को गुणस्थान कहा है।

संक्षिप्त लक्षण: मोह (दर्शन व चारित्र) और योग (मन-वचन-काय की प्रवृत्ति) के तारतम्य से आत्मा में होने वाले क्रमिक परिणामों को गुणस्थान कहते हैं।

गुणस्थान किनके होते हैं? गुणस्थान नियम से संसारी जीवों के ही होते हैं। संसार में ऐसा कोई भी संसारी जीव नहीं है, जो प्रथम से चौदहवें गुणस्थान में से किसी न किसी गुणस्थान में न पाया जाता हो। संसारी अवस्था से पार हो चुके अशरीरी सिद्ध परमेष्ठी गुणस्थानातीत (गुणस्थानों से सर्वथा रहित) होते हैं।

गुणस्थान कितने होते हैं? (क्रमशः १४ नाम)

१४ गुणस्थानों का क्रमिक व विस्तृत विवेचन

१. मिथ्यात्व गुणस्थान

प्रधान भाव: औदयिक (दर्शनमोहनीय) | काल: जघन्य अन्तर्मुहूर्त, उत्कृष्ट अनादि-अनन्त / सादि-सान्त
लक्षण: मिथ्यादर्शन (मिथ्यात्व) नामक दर्शनमोहनीय कर्म के उदय के निमित्त से होने वाले जीव के अतत्त्वश्रद्धानरूप भाव को मिथ्यात्व गुणस्थान कहते हैं। जिसके मिथ्यादर्शन का उदय है, वह मिथ्यादृष्टि है।
दृष्टान्त: जैसे पित्त-ज्वर (बुखार) से ग्रस्त रोगी को मधुर शक्कर-दूध का स्वाद भी कड़वा या अरुचिकर लगता है, वैसे ही मिथ्यात्व कर्म से आक्रान्त जीव को यथार्थ जिनधर्म, वीतराग तत्त्व और हितोपदेश अच्छे नहीं लगते हैं।
पाँच प्रकार के मिथ्यात्व एवं स्वरूप

१. एकान्त मिथ्यात्व

धर्म और धर्मी के विषय में "यह वस्तु ऐसी ही है, सर्वथा इसी प्रकार है" ऐसा हठ रखना। वस्तु के केवल एक अंश को पूरी वस्तु मान लेना। जैसे—वस्तु को सर्वथा नित्य ही मानना अथवा सर्वथा अनित्य (क्षणिक) ही मानना। (दृष्टान्त: बौद्धादि मत)।

२. विपरीत मिथ्यात्व

धर्म और धर्मी के विषय में बिल्कुल उल्टा श्रद्धान करना। जैसे परिग्रहधारी को सच्चा निर्ग्रन्थ मुनि मानना, सर्वज्ञ केवली को कवलाहारी मानना, हिंसायुक्त यज्ञों से धर्म व स्वर्ग मानना या स्त्री को उसी भव से मुक्ति मानना। (दृष्टान्त: याज्ञिक ब्राह्मण मत)।

३. संशय मिथ्यात्व

सच्चे देव-शास्त्र-गुरु एवं सात तत्त्वों के विषय में संशय व दुविधा रखना कि "रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र) मोक्षमार्ग है या नहीं? धर्म रागरूप है या वीतरागरूप?" (दृष्टान्त: श्वेताम्बर इन्द्र गुरु)।

४. वैनयिक मिथ्यात्व

बिना किसी परीक्षा व विवेक के सभी देवताओं, सभी मतों, पाखण्डियों और असत्य ग्रन्थों में समान विनय और समभाव रखना कि "सब धर्म बराबर हैं, सब ईश्वर के रूप हैं।" (दृष्टान्त: तापसी मत)।

५. आज्ञानिक मिथ्यात्व

हित-अहित तथा हेय-उपादेय की परीक्षा के विवेक से सर्वथा शून्य होना। वस्तु के सामान्य-विशेष स्वभाव के प्रति अज्ञानी रहकर किसी भी मत की लकीर पीटना। (दृष्टान्त: मस्करी मत)।

मिथ्यादृष्टि जीवों के १५ सूक्ष्म भेद
  1. अनादि मिथ्यादृष्टि: जिसे आज तक कभी सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं हुआ।
  2. अनादि-अनन्त मिथ्यादृष्टि: जिसे न कभी सम्यक्त्व हुआ है और न अनन्त काल में कभी होगा (अभव्य एवं अभव्य-सम भव्य)।
  3. अनादि-सान्त मिथ्यादृष्टि: जिसे आज तक सम्यक्त्व नहीं हुआ, किन्तु भविष्य में नियम से प्राप्त कर संसार का अन्त करेगा (भव्य)।
  4. सादि-सान्त मिथ्यादृष्टि: जिसने पूर्व में सम्यक्त्व प्राप्त किया था, किन्तु मिथ्यात्व के उदय से पुनः गिरकर मिथ्यात्व में आ गया।
  5. अगृहीत मिथ्यादृष्टि: बिना किसी बाह्य उपदेश के, अनादि से शरीर और आत्मा को एक मानने रूप सहज चला आ रहा नैसर्गिक मिथ्यात्व।
  6. गृहीत मिथ्यादृष्टि: इस मनुष्य भव में अन्य कुगुरु, कुदेव व असत् शास्त्रों के उपदेश से नवीन ग्रहण किया गया विपरीत श्रद्धान।
  7. सातिशय मिथ्यादृष्टि: जो पाँच लब्धियों को पूर्ण कर प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन प्राप्त करने के ठीक अभिमुख (सन्मुख) हो चुका है।
  8. घातायुष्क मिथ्यादृष्टि: जिसने संयम काल में १२वें स्वर्ग से ऊपर की आयु बांधी, पश्चात् संक्लेश से संयम व सम्यक्त्व दोनों की विराधना कर बद्धमान आयु को घटाकर नीचे के स्वर्गों में उत्पन्न होने वाला हुआ।
  9. लब्धोनलब्धिक मिथ्यादृष्टि: जिसने क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य लब्धि कर पाँचवीं करणलब्धि में प्रवेश किया है।
  10. वेदक सम्यक्त्व प्राप्त योग्य मिथ्यादृष्टि: वह सादि मिथ्यादृष्टि जिसकी सत्ता में सम्यक्त्व प्रकृति विद्यमान है (उद्वेलना नहीं हुई)।
  11. २८ मोहनीय प्रकृति की सत्ता वाला: प्रथमोपशम सम्यक्त्व के काल में मिथ्यात्व के ३ टुकड़े (मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्प्रकृति) होने के बाद जो मिथ्यात्व में लौटा।
  12. २७ मोहनीय प्रकृति की सत्ता वाला: २८ प्रकृति वाला जीव जब सम्यक्प्रकृति की उद्वेलना कर सम्यग्मिथ्यात्व रूप कर देता है।
  13. २६ मोहनीय प्रकृति की सत्ता वाला: जब सम्यग्मिथ्यात्व की भी उद्वेलना कर केवल मिथ्यात्व शेष रखता है (अनादि मिथ्यादृष्टि भी २६ सत्ता वाला ही होता है)।
  14. तीर्थङ्कर प्रकृति की सत्ता वाला: नरक आयु बांधकर सम्यक्त्व सहित तीर्थङ्कर प्रकृति बांधी, मरण से अन्तर्मुहूर्त पूर्व मिथ्यात्व में आकर २रे या ३रे नरक में गया।
  15. अनन्तानुबन्धी कषाय रहित मिथ्यादृष्टि: जिसने अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना कर दी थी और पुनः मिथ्यात्व में आने पर १ आवली तक अनन्तानुबन्धी के उदय बिना रहा।
मिथ्यात्व गुणस्थान सम्बन्धी प्रमुख विशेषताएँ व नियम
  • जीव राशि: मिथ्यात्व गुणस्थान में अनन्तानन्त जीव हैं। लोकाकाश में ऐसा कोई भी प्रदेश नहीं है जहाँ मिथ्यादृष्टि जीव न रहते हों।
  • भव्य व अभव्य: इस गुणस्थान में भव्य और अभव्य दोनों प्रकार के जीव रहते हैं।
  • गमन योग्यता: मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय चारों गतियों में जन्म ले सकते हैं। मिथ्यादृष्टि मुनि (द्रव्यलिंगी) नवग्रैवेयक स्वर्ग तक जा सकते हैं।
  • नियम से मिथ्यात्व में रहने वाले: ८५० म्लेच्छ खण्डों के जीव, २री से ७वीं पृथ्वी के नारकी निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में, एकेन्द्रिय से असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक के समस्त जीव, भवनत्रिक में जन्म के अन्तर्मुहूर्त तक के सभी देव-देवियाँ, लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्य और अभव्य जीव नियम से प्रथम गुणस्थान में ही रहते हैं।
  • छूटने के उपाय: सच्चे देव-शास्त्र-गुरु पर निर्दोष श्रद्धान, सात तत्त्वों का यथार्थ भेदज्ञान, आत्मा को देह से भिन्न जानना, सत्संगति, स्वाध्याय और शुभोपयोग।
जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त उत्कृष्ट काल: अनादि-अनन्त / अर्धपुद्गल परावर्तन आने के स्थान: २, ३, ४, ५, ६, ७ जाने के स्थान: ३, ४, ५, ७

२. सासादन सम्यक्त्व गुणस्थान

प्रधान भाव: पारिणामिक (दर्शनमोह की अपेक्षा) | काल: जघन्य १ समय, उत्कृष्ट ६ आवली
लक्षण: स + आसादना = सासादन (आसादना अर्थात् विराधना सहित)। प्रथमोपशम या द्वितीयोपशम सम्यक्त्व के अन्तर्मुहूर्त काल में से जब कम से कम १ समय और अधिक से अधिक ६ आवली काल शेष रह जाए, तब अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ में से किसी एक कषाय का उदय आने से सम्यक्त्व की विराधना हो जाने पर और मिथ्यात्व का उदय न होने तक जो मध्यवर्ती अव्यक्त अतत्त्वश्रद्धान रूप परिणाम होते हैं, उसे सासादन गुणस्थान कहते हैं।
दृष्टान्त:
१. रत्नपर्वत दृष्टान्त: जैसे कोई मनुष्य सम्यक्त्व रूपी रत्नपर्वत के शिखर से गिर चुका हो, किन्तु अभी नीचे मिथ्यात्व रूपी धरती पर नहीं पहुँचा हो; बीच में अधर में लटकने की जो पतनोन्मुख अवस्था है, वही सासादन गुणस्थान है।
२. खीर वमन दृष्टान्त: जैसे किसी ने खीर खाकर वमन कर दी हो, फिर भी जीभ पर किंचित् अव्यक्त स्वाद रह जाता है, वैसे ही छूटे हुए सम्यक्त्व का किंचित् संस्कार यहाँ रहता है।
सासादन सम्यक्त्व की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ एवं रहस्य
  • नियम से पतन: इस गुणस्थान का काल समाप्त होने पर जीव नियम से प्रथम (मिथ्यात्व) गुणस्थान में ही जाता है। यहाँ से कभी कोई जीव ऊपर नहीं चढ़ सकता।
  • प्रथम से गमन असम्भव: पहले गुणस्थान से जीव कभी भी सीधे दूसरे गुणस्थान में नहीं आ सकता; यह केवल चौथे, पाँचवें या छठवें गुणस्थान से गिरते समय ही बनता है।
  • पारिणामिक भाव क्यों?: क्योंकि यहाँ मिथ्यात्व का उदय नहीं है (अतः औदयिक नहीं), उपशम-क्षय-क्षयोपशम नहीं है (अतः औपशमिक, क्षायिक या क्षायोपशमिक नहीं)। दर्शनमोह की अपेक्षा यह कर्मनिरपेक्ष होने से पारिणामिक भाव कहलाता है।
  • अनन्तानुबन्धी की द्विस्वभावता: यद्यपि अनन्तानुबन्धी चारित्रमोहनीय की प्रकृति है, तथापि यह द्विस्वभावी होने से सम्यक्त्व (श्रद्धा) का भी घात करती है और स्वरूपाचरण चारित्र का भी।
  • मरण और गति: सासादन में मरण करने वाला जीव कभी नरक गति में उत्पन्न नहीं होता। यदि नरक की आयु पहले बांध ली हो तो वह सासादन में कभी नहीं आता।
  • अन्तर मार्गणा: यह सान्तर मार्गणा है; कभी ऐसा समय भी आ सकता है जब पूरे तीन लोक में एक भी जीव इस गुणस्थान में न हो।
जघन्य काल: १ समय उत्कृष्ट काल: ६ आवली आने के स्थान: ४, ५, ६ (उपशम सम्यक्त्वी) जाने का स्थान: मात्र १ (मिथ्यात्व)

३. सम्यग्मिथ्यात्व (मिश्र) गुणस्थान

प्रधान भाव: क्षायोपशमिक | काल: जघन्य व उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त मात्र
लक्षण: जात्यन्तर सर्वघाती सम्यग्मिथ्यात्व (मिश्र) प्रकृति के उदय से जहाँ आत्मा में सम्यक्त्व और मिथ्यात्व दोनों के मिश्रित परिणाम पाए जाते हैं, उसे सम्यग्मिथ्यात्व या मिश्र गुणस्थान कहते हैं।
दृष्टान्त: जिस प्रकार दही और गुड़ को एक साथ मिला देने पर जो खट्टा-मीठा मिश्रित स्वाद उत्पन्न होता है, जिसे न केवल खट्टा कह सकते हैं और न केवल मीठा; उसी प्रकार यहाँ सम्यक् और मिथ्या का मिला-जुला श्रद्धान होता है। जैसे कुलवधू का ससुराल जाने पर भी पीहर (मायके) का राग नहीं छूटता।
मिश्र गुणस्थान के ४ स्वर्णिम नियम (प्रतिबन्ध):
  1. मरण नहीं होता: इस गुणस्थान में कभी किसी भी जीव की मृत्यु नहीं होती। मरण करने से पूर्व जीव नियम से सम्यक्त्व (४थे) या मिथ्यात्व (१ले) में जाता है।
  2. मारणान्तिक समुद्घात नहीं होता: यहाँ मारणान्तिक समुद्घात सर्वथा असम्भव है।
  3. आयु बन्ध नहीं होता: इस गुणस्थान में जीव कभी नवीन आयु कर्म का बन्ध नहीं कर सकता।
  4. संयम ग्रहण नहीं होता: इस गुणस्थान वाला जीव न देशसंयम ले सकता है और न सकल संयम।
मिश्र गुणस्थान सम्बन्धी प्रमुख तथ्य
  • अनादि मिथ्यादृष्टि का प्रवेश निषेध: अनादि मिथ्यादृष्टि कभी तीसरे गुणस्थान में नहीं आ सकता, क्योंकि उसके पास सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति की सत्ता ही नहीं होती। केवल सादि मिथ्यादृष्टि ही यहाँ आ सकता है।
  • यहाँ से गमन: इसका काल अन्तर्मुहूर्त समाप्त होने पर जीव या तो चतुर्थ (अविरत सम्यक्त्व) में जाता है अथवा प्रथम (मिथ्यात्व) में गिरता है।
  • तीर्थङ्कर प्रकृति सत्ता वाले: तीर्थङ्कर प्रकृति की सत्ता वाले जीव कभी तीसरे गुणस्थान में नहीं आते।
जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त उत्कृष्ट काल: अन्तर्मुहूर्त आने के स्थान: १ (सादि), ४, ५, ६ जाने के स्थान: १, ४

४. अविरत सम्यक्त्व गुणस्थान

प्रधान भाव: औपशमिक / क्षायोपशमिक / क्षायिक | काल: जघन्य अन्तर्मुहूर्त, उत्कृष्ट ३३ सागर + कुछ कम १ पूर्वकोटि
लक्षण: अनन्तानुबन्धी ४ और दर्शनमोहनीय की प्रकृतियों के उपशम, क्षय या क्षयोपशम से जहाँ सच्चे देव-शास्त्र-गुरु एवं सात तत्त्वों पर अटल, निर्दोष श्रद्धान प्रगट हो गया है, किन्तु अप्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से पाँच पापों व इन्द्रिय विषयों से किंचित् भी विरति (त्याग) नहीं हुई है, उसे अविरत सम्यक्त्व गुणस्थान कहते हैं।
सम्यग्दर्शन के तीन प्रमुख भेद

१. औपशमिक सम्यक्त्व

दर्शनमोहनीय की १, २ या ३ और अनन्तानुबन्धी ४ (कुल ५, ६ या ७) प्रकृतियों के प्रशस्त उपशम से होता है। इसका काल अन्तर्मुहूर्त मात्र है। अनादि मिथ्यादृष्टि सर्वप्रथम यही सम्यक्त्व प्राप्त करता है।

२. क्षायोपशमिक (वेदक) सम्यक्त्व

सम्यक्त्व प्रकृति (देशघाती) के उदय से सहित होता है। इसमें चल, मलिन और अगाढ़ तीन दोष लगते हैं, फिर भी यह नित्य कर्म निर्जरा का कारण है। उत्कृष्ट काल ६६ सागर है।

३. क्षायिक सम्यक्त्व

अनन्तानुबन्धी ४ की विसंयोजना करके दर्शनमोहनीय की तीनों प्रकृतियों का सर्वथा क्षय करने पर प्रकट होता है। यह सादि-अनन्त काल तक स्थिर रहता है और नियम से उसी भव अथवा तीसरे-चौथे भव में मोक्ष कराता है।

सम्यग्दृष्टि के ४ लक्षण एवं ४ भावनाएँ
  • प्रशम: तीव्र क्रोधादि कषायों का अभाव एवं परिणामों में मन्दता।
  • संवेग: संसार और जन्म-मरण के दुःखों से भयभीत रहना तथा मोक्ष की अभिलाषा।
  • अनुकम्पा: प्राणी मात्र के प्रति दया और मैत्री का भाव रखना, दुःखों का निवारण करना।
  • आस्तिक्य: जीवादि तत्त्व, परलोक और मोक्षमार्ग के प्रति दृढ़ प्रतीति।
  • ४ भावनाएँ: मैत्री (सब जीवों से मित्रता), प्रमोद (गुणीजनों को देखकर हर्ष), कारुण्य (दीन-दुखियों पर करुणा), माध्यस्थ (विपरीत प्रवृत्ति वालों पर मध्यस्थ भाव)।
अविरत सम्यक्त्व की विशेषताएँ
  • जघन्य अन्तरात्मा: चतुर्थ गुणस्थानवर्ती जीव को अध्यात्म में 'जघन्य अन्तरात्मा' की संज्ञा प्राप्त होती है।
  • संसार परिमित: सम्यग्दर्शन प्राप्त होते ही जीव का संसार अधिकतम कुछ कम 'अर्द्धपुद्गल परावर्तन' ही शेष रह जाता है।
  • चारों गतियों में सम्भव: यह गुणस्थान नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य और देव चारों गतियों में (पर्याप्त व अपर्याप्त दोनों दशाओं में) पाया जाता है। १६वें स्वर्ग से ऊपर नव अनुदिश व पाँच अनुत्तर विमानों में केवल यही चौथा गुणस्थान होता है।
  • मरण नियम: चतुर्थ गुणस्थानवर्ती मनुष्य व तिर्यञ्च मरण करके नियम से वैमानिक देव ही बनते हैं (नरक या तिर्यञ्च नहीं जाते)।
जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त उत्कृष्ट काल: ३३ सागर + साधिक आने के स्थान: १, ३, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११ जाने के स्थान: १, २, ३, ५, ७

५. देशविरत (संयमासंयम) गुणस्थान

प्रधान भाव: क्षायोपशमिक | काल: जघन्य अन्तर्मुहूर्त, उत्कृष्ट कुछ कम १ पूर्वकोटि
लक्षण: जहाँ अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यानावरण कषाय के अनुदय से पाँच पापों का एकदेश (स्थूल) त्याग हो जाता है, किन्तु प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से पूर्ण संयम (महाव्रत) नहीं हो पाता, उसे देशविरत, संयमासंयम या विरताविरत गुणस्थान कहते हैं।
विरताविरत का स्वरूप: एक ही समय में यह जीव 'विरत' भी है और 'अविरत' भी। त्रस जीवों की हिंसा से विरत (त्यागी) है, किन्तु स्थावर जीवों की हिंसा से अविरत (अत्यागी) है।
देशविरत की ११ प्रतिमाएँ (श्रावक के उत्थान के सोपान)

१. दर्शन, २. व्रत (१२ व्रत), ३. सामायिक, ४. प्रोषधोपवास, ५. सचित्त त्याग, ६. रात्रिभुक्ति त्याग (दिवामैथुन त्याग), ७. ब्रह्मचर्य, ८. आरम्भ त्याग, ९. परिग्रह त्याग, १०. अनुमति त्याग, ११. उद्दिष्ट त्याग (क्षुल्लक व ऐलक)।

विशेषताएँ एवं पात्रता
  • पात्रता: यह गुणस्थान केवल कर्मभूमि के मनुष्यों एवं संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चों को ही हो सकता है। भोगभूमि के मनुष्य-तिर्यञ्चों, देवों और नारकियों को यह गुणस्थान कभी नहीं होता।
  • आयु सीमा: मनुष्य गति में जन्म के ८ वर्ष और १ अन्तर्मुहूर्त के बाद ही यह गुणस्थान प्राप्त हो सकता है।
  • मरण गति: इस गुणस्थान में मरण करने वाले मनुष्य और तिर्यञ्च नियम से वैमानिक देवों में ही उत्पन्न होते हैं।
  • द्रव्य वेद: द्रव्य नपुंसक वेद वाले मनुष्य व तिर्यञ्च भी इस गुणस्थान को धारण कर सकते हैं।
जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त उत्कृष्ट काल: ३ अन्तर्मुहूर्त कम १ पूर्वकोटि आने के स्थान: १, ४, ६ जाने के स्थान: १, २, ३, ४, ७

६. प्रमत्तविरत गुणस्थान

प्रधान भाव: क्षायोपशमिक (चारित्रमोह) | काल: जघन्य १ समय (मरण अपेक्षा), उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त
लक्षण: जहाँ अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण इन तीन कषाय चौकड़ी के अनुदय से सकल संयम (२८ मूलगुण व महाव्रत) तो प्रगट हो गया है, किन्तु संज्वलन कषाय और नोकषाय के तीव्र उदय से संयम में मल उत्पन्न करने वाला प्रमाद रहता है, उसे प्रमत्तविरत गुणस्थान कहते हैं।
१५ प्रमाद के भेद एवं स्वरूप

४ विकथा

संयम विरोधी चर्चा: १. स्त्रीकथा (रागवर्धक बातें), २. भक्तकथा (भोजन-स्वाद सम्बन्धी), ३. राष्ट्रकथा (देश-राजनीति की बातें), ४. अवनिपालकथा (राजा, चोर व युद्ध की चर्चा)।

४ कषाय व ५ इन्द्रिय

क्रोध, मान, माया, लोभ का उदय तथा स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र पाँचों इन्द्रियों के विषयों में असंयम व चंचलता होना।

१ निद्रा व १ स्नेह

निद्रा व प्रचला के तीव्र उदय से पदार्थों के ग्रहण को रोकने वाली तन्द्रा (निद्रा) तथा बाह्य शरीर, शिष्यादि व उपकरणों में ममत्व भाव (स्नेह)।

प्रमाद गणित निरूपण (८० प्रमाद भंग, प्रस्तार, नष्ट व उद्दिष्ट)

आगम में प्रमाद के कुल भेदों का विस्तार ८० भंग रूप बतलाया गया है: ४ विकथा × ४ कषाय × ५ इन्द्रिय × १ निद्रा × १ स्नेह = ८० प्रमाद भंग।

प्रस्तार प्रकार प्रथम पिण्ड द्वितीय पिण्ड तृतीय पिण्ड गूढ़ यंत्र अंक स्थापना
प्रथम प्रस्तार ५ इन्द्रिय ४ कषाय ४ विकथा इन्द्रिय: १, २, ३, ४, ५ | कषाय: ०, ५, १०, १५ | विकथा: ०, २०, ४०, ६०
द्वितीय प्रस्तार ४ विकथा ४ कषाय ५ इन्द्रिय विकथा: १, २, ३, ४ | कषाय: ०, ४, ८, १२ | इन्द्रिय: ०, १६, ३२, ४८, ६४
प्रमत्तविरत की प्रमुख विशेषताएँ
  • केवल दिगम्बर मुनिराज: यह गुणस्थान केवल दिगम्बर जैन मुनिराजों को ही होता है।
  • चढ़ते समय नहीं बनता: मुनि दीक्षा लेते समय जीव पहले सीधे सातवें (अप्रमत्त) गुणस्थान में जाता है, फिर सातवें से गिरकर छठवें में आता है। यह उतरते समय का गुणस्थान है।
  • ऋद्धि व शरीर: आहारक शरीर और आहारक द्विक का प्रारम्भ तथा ऋद्धियों का प्रयोग इसी गुणस्थान में सम्भव है।
  • शुद्ध मनुष्य संज्ञा: छठवें गुणस्थान से ऊपर केवल मनुष्य गति ही होती है; देव, नारकी व तिर्यञ्च नहीं होते।
जघन्य काल: १ समय (मरण अपेक्षा) उत्कृष्ट काल: अन्तर्मुहूर्त आने का स्थान: मात्र ७ जाने के स्थान: १, २, ३, ४, ५, ७

७. अप्रमत्तविरत गुणस्थान

प्रधान भाव: क्षायोपशमिक / औपशमिक / क्षायिक | काल: जघन्य १ समय, उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त
लक्षण: जहाँ संज्वलन कषाय और नोकषाय का मन्द उदय हो जाने से समस्त १५ प्रकार के व्यक्ताव्यक्त प्रमादों का सर्वथा अभाव हो जाता है और मुनिराज आत्म-ध्यान में लीन रहते हैं, उसे अप्रमत्तविरत गुणस्थान कहते हैं।
अप्रमत्तविरत के दो भेद

१. स्वस्थान अप्रमत्त

जहाँ मुनिराज अंतर्मुहूर्त-अंतर्मुहूर्त में छठवें और सातवें गुणस्थान के मध्य झूलते रहते हैं (हजारों बार परिवर्तन करते हैं)। वर्तमान पञ्चमकाल में मुनिराज इसी स्वस्थान अप्रमत्त तक ही रह सकते हैं।

२. सातिशय अप्रमत्त

जब मुनिराज उपशम श्रेणी या क्षपक श्रेणी चढ़ने के सन्मुख होकर अधःप्रवृत्तकरण नामक प्रथम करण परिणाम प्रारम्भ करते हैं, तब उन्हें सातिशय अप्रमत्त कहते हैं। यहाँ से वे नियम से ८वें गुणस्थान में प्रवेश करते हैं।

अधःप्रवृत्तकरण के ४ प्रमुख आवश्यक (कार्य)
  1. प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धि: आत्मा के परिणामों में प्रतिसमय अनन्तगुणी निर्मलता बढ़ती है।
  2. स्थिति-बन्धापसरण: नवीन बंधने वाले समस्त कर्मों की स्थिति हर अन्तर्मुहूर्त में घट-घट कर बंधती है।
  3. पाप प्रकृतियों का अनुभाग-बन्धापसरण: बंधने वाले पाप कर्मों की फलदान शक्ति प्रतिसमय अनन्तगुणी हीन-हीन होकर बंधती है (द्विस्थानीय बंध)।
  4. पुण्य प्रकृतियों का बढ़ता अनुभाग-बन्ध: बंधने वाली पुण्य प्रकृतियों का अनुभाग प्रतिसमय अनन्तगुणा अधिक-अधिक बंधता है (चतुःस्थानीय बंध)।
जघन्य काल: १ समय उत्कृष्ट काल: अन्तर्मुहूर्त आने के स्थान: १, ४, ५, ६, ८ (उपशम) जाने के स्थान: ६, ८ (मरण कर ४)

८. अपूर्वकरण गुणस्थान

प्रधान भाव: औपशमिक / क्षायिक | काल: जघन्य व उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त (मरण अपेक्षा १ समय)
लक्षण: अ = नहीं, पूर्व = पहले, करण = परिणाम। जिस गुणस्थान में आत्मा के ऐसे विशुद्ध परिणाम उत्पन्न होते हैं जो पूर्व में कभी भी प्राप्त नहीं हुए थे। यहाँ भिन्न समयवर्ती जीवों के परिणाम नियम से भिन्न ही होते हैं, किन्तु एक समयवर्ती जीवों के परिणाम समान भी हो सकते हैं और असमान भी।
श्रेणी व्यवस्था (उपशम श्रेणी बनाम क्षपक श्रेणी)

आठवें गुणस्थान से 'श्रेणी' प्रारम्भ होती है:

  • उपशम श्रेणी: द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि अथवा क्षायिक सम्यग्दृष्टि मुनि चढ़ते हैं। इसमें चारित्रमोहनीय की २१ प्रकृतियों को दबाया (उपशमित) किया जाता है। यहाँ से जीव नियम से नीचे गिरता है। मरण होने पर वैमानिक देव बनता है। एक भव में अधिकतम २ बार और संसार में ४ बार चढ़ी जा सकती है।
  • क्षपक श्रेणी: केवल क्षायिक सम्यग्दृष्टि मुनि ही चढ़ते हैं। इसमें २१ प्रकृतियों का सर्वथा समूल नाश (क्षय) किया जाता है। क्षपक श्रेणी में कभी मरण नहीं होता और जीव नियम से उसी भव में मोक्ष प्राप्त करता है।
अपूर्वकरण में होने वाले ४ महान् कार्य (सत्ता के कर्मों में)

१. स्थितिकाण्डक घात

सत्ता में स्थित कर्मों की स्थिति के विशाल समूह को हर अन्तर्मुहूर्त में काटकर नष्ट करना (आयु कर्म का घात नहीं होता)। जैसे नारियल के गोले को घिसकर कम करना।

२. अनुभागकाण्डक घात

सत्ता में स्थित पाप प्रकृतियों के अनुभाग (रस/तीव्रता) को हर अन्तर्मुहूर्त में अनन्त बहुभाग नष्ट करना। जैसे ककड़ी के विषैले भाग को घिसकर जहर कम करना।

३. गुणश्रेणी निर्जरा

सत्ता में संचित कर्म परमाणुओं की प्रतिसमय असंख्यात-गुणाकार क्रम से निर्जरा होना (जैसे २०, ६०, १८०, ५४०... परमाणु प्रतिसमय झड़ना)।

४. गुणसंक्रमण

सत्ता में स्थित अप्रशस्त (पाप) प्रकृतियों के परमाणुओं का प्रतिसमय असंख्यातगुणी श्रेणी से वर्तमान में बंधने वाली प्रशस्त प्रकृतियों के रूप में परिणत हो जाना।

जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त / १ समय उत्कृष्ट काल: अन्तर्मुहूर्त आने के स्थान: ७, ९ (उपशम) जाने के स्थान: ७, ९ (मरण कर ४)

९. अनिवृत्तिकरण गुणस्थान

प्रधान भाव: औपशमिक / क्षायिक | काल: जघन्य व उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त (मरण अपेक्षा १ समय)
लक्षण: अ + निवृत्ति + करण = जहाँ विशुद्ध परिणामों में परस्पर कोई भेद (निवृत्ति) न हो। इस गुणस्थान के अन्तर्मुहूर्त काल के किसी एक ही समय में रहने वाले अनेक जीवों के शरीर, रूप, अवगाहना भिन्न हो सकते हैं, किन्तु उनके परिणामों में किंचित् भी भेद नहीं होता; सबके परिणाम सर्वथा समान होते हैं।
अनिवृत्तिकरण के कार्य एवं कृष्टि रचना
  • ९ भाग: इस गुणस्थान के काल के ९ भाग किए जाते हैं; प्रारम्भ के ६ भाग 'सवेद भाग' (स्त्री, पुं, नपुंसक वेद सहित) और अन्तिम ३ भाग 'अवेद भाग' कहलाते हैं।
  • प्रकृतियों का उपशम/क्षय: उपशम श्रेणी वाला यहाँ अप्रत्याख्यानावरण ४, प्रत्याख्यानावरण ४, संज्वलन क्रोध, मान, माया और ९ नोकषाय (कुल २० प्रकृतियों) का उपशम करता है। क्षपक श्रेणी वाला इनका क्षय करता है।
  • १६ प्रकृतियों का क्षय: क्षपक श्रेणी वाला मुनि इसी गुणस्थान में स्त्यानगृद्धि, निद्रा-निद्रा, प्रचला-प्रचला और नामकर्म की अप्रशस्त १३ (कुल १६) प्रकृतियों का क्षय करता है।
  • बादर से सूक्ष्म कृष्टि: कषाय के अनुभाग को अत्यधिक घटाने हेतु बादर कृष्टि से सूक्ष्म कृष्टि की जाती है। जैसे अनार के दाने निकालकर फिर उनका सूक्ष्म रस निकाला जाता है।
जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त / १ समय उत्कृष्ट काल: अन्तर्मुहूर्त आने के स्थान: ८, १० (उपशम) जाने के स्थान: ८, १० (मरण कर ४)

१०. सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान

प्रधान भाव: औपशमिक / क्षायिक | काल: जघन्य व उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त
लक्षण: सूक्ष्म = अत्यन्त बारीक, साम्पराय = कषाय। जिस गुणस्थान में केवल संज्वलन लोभ कषाय का अत्यन्त सूक्ष्म उदय विद्यमान रहता है, उसे सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान कहते हैं।
दृष्टान्त: जिस प्रकार कसूम्भी रंग से रंगे हुए वस्त्र को कई बार धो डालने पर भी उसमें लालिमा की अत्यन्त सूक्ष्म झलक शेष रह जाती है, उसी प्रकार यहाँ केवल सूक्ष्म लोभ कषाय की रंचमात्र झलक रहती है।
विशेषताएँ
  • कषाय सहित अन्तिम गुणस्थान: कषाय के उदय सहित संसारी जीवों का यह सबसे अन्तिम गुणस्थान है। इसके आगे किसी कषाय का उदय नहीं होता।
  • सूक्ष्म साम्पराय संयम: यहाँ सूक्ष्म साम्पराय संयम होता है, जो पूर्ण यथाख्यात संयम से किंचित् ही न्यून होता है।
  • गमन: क्षपक श्रेणी वाले मुनि सूक्ष्म लोभ का सर्वथा क्षय करके सीधे १२वें (क्षीणमोह) में जाते हैं। उपशम श्रेणी वाले सूक्ष्म लोभ का उपशम करके ११वें (उपशान्तमोह) में जाते हैं।
जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त / १ समय उत्कृष्ट काल: अन्तर्मुहूर्त आने के स्थान: ९, ११ (उपशम) जाने के स्थान: ९, ११ (उपशम), १२ (क्षपक)

११. उपशान्तमोह गुणस्थान

प्रधान भाव: औपशमिक | काल: जघन्य व उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त (मरण अपेक्षा १ समय)
लक्षण: मोहनीय कर्म की समस्त २१ प्रकृतियों (अथवा दर्शनमोह सहित २८ प्रकृतियों) के पूर्ण उपशम से उत्पन्न होने वाली परम वीतराग निर्मल दशा को उपशान्तमोह (प्रशान्तमोह) गुणस्थान कहते हैं।
दृष्टान्त: जिस प्रकार निर्मली फल (कतकफल) डाल देने से जल का सारा मैल नीचे तलहटी में बैठ जाता है और ऊपर का पानी शीशे की तरह स्वच्छ हो जाता है, उसी प्रकार यहाँ मोहनीय कर्म नीचे दबा हुआ है और आत्मा ऊपर से पूर्ण वीतरागी है।
पतन का सार्वभौमिक नियम: इस गुणस्थान से मुनिराज नियम से नीचे गिरते ही गिरते हैं, क्योंकि कर्म केवल दबे हैं, नष्ट नहीं हुए। पतन के दो कारण हैं:
  1. कालक्षय: गुणस्थान का अन्तर्मुहूर्त काल समाप्त होते ही कषायों के उभरने से उतरकर क्रमशः १०वें, ९वें, ८वें, ७वें आदि में आते हैं और कभी-कभी मिथ्यात्व तक पहुँच जाते हैं।
  2. भवक्षय: यदि इस गुणस्थान में आयु समाप्त हो जाए, तो मरण करके नियम से चतुर्थ गुणस्थानवर्ती अनुत्तर या वैमानिक देव बनते हैं।
जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त / १ समय उत्कृष्ट काल: अन्तर्मुहूर्त आने का स्थान: मात्र १० (उपशम श्रेणी) जाने के स्थान: १० (मरण कर ४)

१२. क्षीणमोह गुणस्थान

प्रधान भाव: क्षायिक | काल: जघन्य व उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त मात्र
लक्षण: जिसने मोहनीय कर्म का जड़-मूल से सर्वथा क्षय कर दिया है। स्फटिक मणि के निर्मल पात्र में रखे हुए स्वच्छ जल के समान जिसका चित्त सदा के लिए निष्कलंक व वीतराग हो चुका है, उसे क्षीणमोह (क्षीणकषाय) गुणस्थानवर्ती वीतराग छद्मस्थ कहते हैं।
विशेषताएँ एवं घातिया कर्मों का नाश
  • अप्रतिपाती: यह अप्रतिपाती गुणस्थान है, अर्थात् यहाँ से कभी पतन नहीं होता। यहाँ केवल क्षपक श्रेणी वाले जीव ही १०वें गुणस्थान से आते हैं।
  • शेष ३ घातिया कर्मों का क्षय: इस गुणस्थान के अन्तिम समय में ज्ञानावरणीय की ५, दर्शनावरणीय की ४ और अन्तराय की ५ (कुल शेष घातिया कर्मों) का एक साथ नाश हो जाता है।
  • निगोदिया जीवों का निष्कासन: इस गुणस्थान के अन्त में मुनिराज के औदारिक शरीर से समस्त सूक्ष्म निगोदिया जीवों का सर्वथा निष्कासन हो जाता है।
  • वज्रवृषभनाराच संहनन: केवल उत्तम वज्रवृषभनाराच संहनन वाले मुनि ही इस गुणस्थान में प्रवेश कर केवलज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त उत्कृष्ट काल: अन्तर्मुहूर्त आने का स्थान: मात्र १० (क्षपक श्रेणी) जाने का स्थान: मात्र १३ (सयोगकेवली)

१३. सयोगकेवली गुणस्थान

प्रधान भाव: क्षायिक | काल: जघन्य अन्तर्मुहूर्त, उत्कृष्ट १ पूर्वकोटि में ८ वर्ष व ८ अन्तर्मुहूर्त कम
लक्षण: चारों घातिया कर्मों का नाश हो जाने से जहाँ अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख और अनन्तवीर्य (अनन्त चतुष्टय) प्रगट हो चुके हैं, वे 'केवली' हैं। और जब तक उनके मन-वचन-काय रूप योगों का कम्पन विद्यमान रहता है, तब तक उन्हें 'सयोगकेवली जिन' (अरिहन्त परमेष्ठी) कहते हैं।
सयोगकेवली दशा की अलौकिक विशेषताएँ
  • केवलज्ञान सूर्य: केवलज्ञान प्रगट होते ही तीनों लोकों के समस्त भूत, भविष्यत् और वर्तमान द्रव्य-पर्याय दर्पण के समान ज्ञान में युगपत् प्रत्यक्ष झलकते हैं।
  • दर्शन व ज्ञान युगपत्: १ से १२ गुणस्थान तक पहले दर्शन फिर ज्ञान होता है, किन्तु १३वें-१४वें गुणस्थान व सिद्धों में दर्शन और ज्ञान दोनों एक ही साथ (युगपत्) होते हैं।
  • समवसरण व गन्धकुटी: तीर्थङ्कर केवली भगवान के लिए इन्द्रों द्वारा १२ सभाओं वाले भव्य समवसरण की रचना होती है और सामान्य केवली के लिए गन्धकुटी की रचना होती है।
  • परम औदारिक शरीर: केवली भगवान का शरीर धातु-उपधातु, पसीने, रोग व मल-मूत्र से रहित 'परम औदारिक शरीर' में परिवर्तित हो जाता है और वे पृथ्वी से ५००० धनुष अधर आकाश में कमल पर विराजमान रहते हैं।
  • केवली समुद्घात: यदि आयु कर्म अन्तर्मुहूर्त शेष रह जाए और शेष तीन अघातिया कर्मों (वेदनीय, नाम, गोत्र) की स्थिति अधिक हो, तो चारों कर्मों की स्थिति को बराबर करने हेतु केवली भगवान दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण रूप ८ समय का समुद्घात करते हैं।
जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त उत्कृष्ट काल: लगभग १ पूर्वकोटि आने का स्थान: मात्र १२ (क्षीणमोह) जाने का स्थान: मात्र १४ (अयोगकेवली)

१४. अयोगकेवली गुणस्थान

प्रधान भाव: क्षायिक | काल: जघन्य व उत्कृष्ट ५ ह्रस्व अक्षर (अ, इ, उ, ऋ, लृ) उच्चारण काल
लक्षण: अ + योग + केवली = जहाँ मन, वचन और काय तीनों योगों का सर्वथा निरोध हो चुका है। जिन्होंने शील के १८,००० भेदों के अखण्ड स्वामित्व (शैलेष्य अवस्था) को प्राप्त कर लिया है, समस्त नवीन आस्रव द्वार बन्द हो चुके हैं और जो समस्त कर्मरज से सर्वथा मुक्त होने के सम्मुख हैं, वे अयोगकेवली कहलाते हैं।
अयोगकेवली का काल एवं कर्मक्षय की प्रक्रिया
  • कालमान: किसी वचन-ऋद्धिधारी मुनि द्वारा पाँच ह्रस्व अक्षरों—अ, इ, उ, ऋ, लृ के स्वाभाविक उच्चारण में जितना समय लगता है (अत्यन्त सूक्ष्म अन्तर्मुहूर्त), उतना ही इस गुणस्थान का काल होता है।
  • उपान्त्य समय (अन्तिम से एक पहले): ७२ प्रकृतियों का क्षय हो जाता है।
  • चरम समय (अन्तिम समय): शेष १३ प्रकृतियों का क्षय हो जाता है।
  • मोक्ष गमन: कुल ८५ अघातिया प्रकृतियों का सर्वथा विनाश कर आत्मा अगले ही समय में ऋजुगति (सीधी रेखा) से ऊर्ध्वगमन करती हुई लोक के अग्रभाग स्थित सिद्धालय में पहुँच जाती है।
जघन्य काल: ५ ह्रस्व अक्षर काल उत्कृष्ट काल: ५ ह्रस्व अक्षर काल आने का स्थान: मात्र १३ (सयोगकेवली) जाने का स्थान: गुणस्थानातीत मोक्ष (सिद्ध पद)

गुणस्थानातीत दशा: सिद्ध भगवान प्ररूपणा

सिद्ध भगवान (अशरीरी परमात्मा)

अवस्था: गुणस्थानातीत, निष्कल, सादि-अनन्त
लक्षण: जो आठों कर्मों से सर्वथा रहित हैं, परम शांत, निरंजन, नित्य, आठ गुणों से मण्डित, कृतकृत्य और लोक के अग्रभाग पर विराजमान हैं, वे सिद्ध भगवान हैं।
आठ कर्मों के क्षय से प्रकट आठ आत्मिक गुण
नष्ट कर्म प्रकृति प्रकट सिद्ध गुण गुण का आध्यात्मिक स्वरूप
१. ज्ञानावरणीय केवलज्ञान समस्त लोकालोक के त्रिकालवर्ती पदार्थों को प्रत्यक्ष जानना।
२. दर्शनावरणीय केवलदर्शन समस्त पदार्थों की सामान्य सत्ता का प्रत्यक्ष प्रतिभास।
३. वेदनीय अव्याबाध सुख समस्त शारीरिक-मानसिक बाधाओं से रहित अतीन्द्रिय अनन्त सुख।
४. मोहनीय क्षायिक सम्यक्त्व सदा निष्कम्प, निर्विकार, अटल आत्म-श्रद्धान।
५. आयु अवगाहनत्व एक-दूसरे के स्थान में बिना बाधा दिए समाहित होना (अनन्त सिद्ध एक ही क्षेत्र में)।
६. नाम सूक्ष्मत्व (अमूर्तत्व) इन्द्रियों, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श और समस्त भौतिक आकारों से रहित।
७. गोत्र अगुरुलघुत्व न भारी होना, न हल्का होना; षड्गुणी हानि-वृद्धि रूप सहज परिणमन।
८. अन्तराय अनन्तवीर्य अनन्त आत्मिक सामर्थ्य व अखण्ड शक्ति।
सिद्ध भगवान सम्बन्धी प्रमुख आगम रहस्य
  • निवास स्थान: मनुष्य लोक (अढ़ाई द्वीप) के ठीक ऊपर, आठवें ईषत्प्राग्भार भूमि में स्थित सिद्धशिला के ऊपर, अन्तिम तनुवातवलय के शिखर भाग में स्थित हैं।
  • अवगाहना (आकार): सिद्ध भगवान निराकार (अमूर्त) हैं, फिर भी आत्मप्रदेशों की अपेक्षा अन्तिम मनुष्य शरीर से किंचित् न्यून (१/३ भाग कम) किंचित् न्यून पुरुषाकार होते हैं। उत्कृष्ट अवगाहना कुछ कम ५२५ धनुष और जघन्य कुछ कम साढ़े तीन हाथ होती है।
  • लोक प्रमाण क्यों नहीं फैलते?: संकोच और विस्तार का कारण नामकर्म था। नामकर्म का अभाव हो जाने से सिद्धों के आत्मप्रदेश न फैलते हैं और न सिकुड़ते हैं; अन्तिम शरीर के आकार में सदा स्थिर रहते हैं। (जैसे सिकने के बाद रोटी में संकोच-विस्तार समाप्त हो जाता है)।
  • सुख की तुलना: त्रैलोक्य के समस्त चक्रवर्तियों, इन्द्रों और अहमिन्द्रों के त्रिकाल सम्बन्धी समस्त सुखों को एकत्र कर अनन्त से गुणा किया जाए, तो भी सिद्धों के एक क्षण मात्र के अतीन्द्रिय सुख की बराबरी नहीं हो सकती।
  • ८ अन्य दर्शनों की मान्यताओं का खण्डन: सदाशिव (सदा मुक्त मानना), सांख्य (मुक्ति में सुख न मानना), मस्करी (मुक्ति से पुनर्जन्म मानना), बौद्ध (आत्मा का सर्वथा नाश मानना), नैयायिक-वैशेषिक (मुक्ति में बुद्धि आदि गुणों का नाश मानना), ईश्वर-कर्तृत्त्ववादी (मुक्ति के बाद भी सृष्टि कार्य मानना) और मण्डली मत का आगम प्रमाणों द्वारा युक्तियुक्त निराकरण किया गया है।

गुणस्थान गमनागमन एवं काल समीक्षा सारणी

गुणस्थान कहाँ-कहाँ से आते हैं? कहाँ-कहाँ जा सकते हैं? उत्कृष्ट काल जघन्य काल
१. मिथ्यात्व २, ३, ४, ५, ६ ३ (सादि), ४, ५, ७ अनादि-अनन्त / सादि-सान्त (अर्धपुद्गल परावर्तन) अन्तर्मुहूर्त
२. सासादन सम्यक्त्व ४, ५, ६ (केवल उपशम सम्यक्त्वी) मात्र १ (मिथ्यात्व) में ६ आवली १ समय
३. सम्यग्मिथ्यात्व (मिश्र) १ (सादि), ४, ५, ६ १, ४ अन्तर्मुहूर्त अन्तर्मुहूर्त
४. अविरत सम्यक्त्व १, ३, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११ १, २, ३, ५, ७ ३३ सागर + कुछ कम १ पूर्वकोटि अन्तर्मुहूर्त
५. देशविरत (संयमासंयम) १, ४, ६ १, २, ३, ४, ७ ३ अन्तर्मुहूर्त कम १ पूर्वकोटि अन्तर्मुहूर्त
६. प्रमत्तविरत मात्र ७ (उतरते समय) १, २, ३, ४, ५, ७ अन्तर्मुहूर्त १ समय (मरण अपेक्षा)
७. अप्रमत्तविरत १, ४, ५, ६, ८ (उपशम श्रेणी) ६, ८ (मरण होने पर ४) अन्तर्मुहूर्त १ समय (मरण अपेक्षा)
८. अपूर्वकरण ७, ९ (उपशम श्रेणी) ७, ९ (मरण होने पर ४) अन्तर्मुहूर्त १ समय (उपशम) / अन्तर्मुहूर्त
९. अनिवृत्तिकरण ८, १० (उपशम श्रेणी) ८, १० (मरण होने पर ४) अन्तर्मुहूर्त १ समय (उपशम) / अन्तर्मुहूर्त
१०. सूक्ष्मसाम्पराय ९, ११ (उपशम श्रेणी) ९, ११ (उपशम), १२ (क्षपक) अन्तर्मुहूर्त १ समय (उपशम) / अन्तर्मुहूर्त
११. उपशान्तमोह मात्र १० (उपशम श्रेणी) १० (मरण होने पर ४) अन्तर्मुहूर्त १ समय (मरण अपेक्षा)
१२. क्षीणमोह मात्र १० (क्षपक श्रेणी) मात्र १३ (सयोगकेवली) अन्तर्मुहूर्त अन्तर्मुहूर्त
१३. सयोगकेवली मात्र १२ (क्षीणमोह) मात्र १४ (अयोगकेवली) १ पूर्वकोटि में ८ वर्ष व ८ अन्तर्मुहूर्त कम अन्तर्मुहूर्त
१४. अयोगकेवली मात्र १३ (सयोगकेवली) गुणस्थानातीत मोक्ष (सिद्ध पद) ५ ह्रस्व अक्षर उच्चारण काल ५ ह्रस्व अक्षर उच्चारण काल

आगम आधार: गोम्मटसार जीवकाण्ड, षट्खण्डागम (धवला टीका), तत्त्वार्थसूत्र व राजवार्तिक, त्रिलोकसार।

सर्वज्ञ वीतराग वाणी | जिनधर्म प्रभावना एवं स्वाध्याय हेतु समर्पित

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