लक्षण: जहाँ अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यानावरण कषाय के अनुदय से पाँच पापों का एकदेश (स्थूल) त्याग हो जाता है, किन्तु प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से पूर्ण संयम (महाव्रत) नहीं हो पाता, उसे देशविरत, संयमासंयम या विरताविरत गुणस्थान कहते हैं।
विरताविरत का स्वरूप: एक ही समय में यह जीव 'विरत' भी है और 'अविरत' भी। त्रस जीवों की हिंसा से विरत (त्यागी) है, किन्तु स्थावर जीवों की हिंसा से अविरत (अत्यागी) है।
देशविरत की ११ प्रतिमाएँ (श्रावक के उत्थान के सोपान)
१. दर्शन, २. व्रत (१२ व्रत), ३. सामायिक, ४. प्रोषधोपवास, ५. सचित्त त्याग, ६. रात्रिभुक्ति त्याग (दिवामैथुन त्याग), ७. ब्रह्मचर्य, ८. आरम्भ त्याग, ९. परिग्रह त्याग, १०. अनुमति त्याग, ११. उद्दिष्ट त्याग (क्षुल्लक व ऐलक)।
विशेषताएँ एवं पात्रता
- पात्रता: यह गुणस्थान केवल कर्मभूमि के मनुष्यों एवं संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चों को ही हो सकता है। भोगभूमि के मनुष्य-तिर्यञ्चों, देवों और नारकियों को यह गुणस्थान कभी नहीं होता।
- आयु सीमा: मनुष्य गति में जन्म के ८ वर्ष और १ अन्तर्मुहूर्त के बाद ही यह गुणस्थान प्राप्त हो सकता है।
- मरण गति: इस गुणस्थान में मरण करने वाले मनुष्य और तिर्यञ्च नियम से वैमानिक देवों में ही उत्पन्न होते हैं।
- द्रव्य वेद: द्रव्य नपुंसक वेद वाले मनुष्य व तिर्यञ्च भी इस गुणस्थान को धारण कर सकते हैं।
जघन्य काल: अन्तर्मुहूर्त
उत्कृष्ट काल: ३ अन्तर्मुहूर्त कम १ पूर्वकोटि
आने के स्थान: १, ४, ६
जाने के स्थान: १, २, ३, ४, ७