छह द्रव्य और लोक

04 Nov 2026 Admin
षड्द्रव्य एवं सप्ततत्त्व मीमांसा | जैन दर्शन एवं वैज्ञानिक विश्लेषण
जैनकोष • द्रव्यानुयोग
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षड्द्रव्य एवं सप्ततत्त्व मीमांसा

छह शाश्वत द्रव्य, गुण-पर्याय की व्यवस्था एवं जीव-अजीव के संयोग से घटित होने वाले सात तत्त्वों का प्रामाणिक विवेचन।

लोक की परिभाषा एवं त्रि-विभाजन

छह द्रव्यों—जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश एवं काल के समूह को लोक कहा जाता है। चौदह राजु प्रमाण ऊँचाई वाला यह लोक अनादि-निधन है और तीन मुख्य भागों में विभक्त है:

१. ऊर्ध्वलोक मध्यलोक के ऊपर स्थित भाग, जहाँ सौधर्म से अच्युत तक १६ स्वर्ग, ९ ग्रैवेयक, ९ अनुदिश, ५ अनुत्तर विमान और सिद्धशिला स्थित है।
२. मध्यलोक जहाँ असंख्यात द्वीप और समुद्र वलय के आकार में स्थित हैं। यहाँ मनुष्य और तिर्यञ्च जीवों का निवास होता है।
३. अधोलोक मध्यलोक के नीचे सात नरक भूमियाँ अवस्थित हैं, जहाँ नारकी जीव अपने अशुभ कर्मों का संक्लेशमय फल भोगते हैं।
तीन लोक संरचना - जैन दर्शन १४ राजु प्रमाण तीन लोक

द्रव्य, गुण और पर्याय की तात्त्विक व्यवस्था

आचार्य उमास्वामी ने तत्त्वार्थसूत्र में द्रव्य का शाश्वत लक्षण दिया है: गुणपर्ययवद् द्रव्यम्। जो गुणों और पर्यायों से युक्त हो, उसे द्रव्य कहते हैं। द्रव्य के बिना गुण और पर्याय नहीं होते, और गुण-पर्याय के बिना कोई द्रव्य नहीं होता।

१. द्रव्य: जो शाश्वत, ध्रुव और अविनाशी है, जो पहले भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा।
२. गुण: जो द्रव्य की हर अवस्था में सदा साथ रहे, वह गुण है। जैसे जीव में ज्ञान-दर्शन चेतना और सुवर्ण में पीलापन।
३. पर्याय: द्रव्य और गुणों की निरंतर बदलने वाली अवस्था को पर्याय कहते हैं। जैसे सुवर्ण से कंगन बनना या जीव का मनुष्य रूप होना।
शुद्ध-अशुद्ध वर्गीकरण: छह द्रव्यों में केवल जीव और पुद्गल शुद्ध एवं अशुद्ध रूप में परिणत होते हैं। शेष चार द्रव्य (धर्म, अधर्म, आकाश, काल) सदा शुद्ध रहते हैं।

छह द्रव्यों का शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक विवेचन

१

जीव द्रव्य

अनन्तानन्त • असंख्यात प्रदेशी

लक्षण: जिसमें दर्शन, ज्ञान रूप चेतना पाई जाती है, जो जीता था, जी रहा है और सदैव रहेगा।

भेद: मुक्त जीव (शुद्ध सिद्ध परमात्मा) और संसारी जीव (चारों गतियों में भ्रमण करने वाले जीव)।

उपकार: परस्परोपग्रहो जीवानाम्—जीव परस्पर एक-दूसरे के सहायक बनते हैं।

२

पुद्गल द्रव्य

मूर्तिक • पूरण-गलन

लक्षण: जिसमें स्पर्श, रस, गंध और वर्ण पाए जाते हैं। मिलना और बिछुड़ना (पूरण-गलन) इसका स्वभाव है।

भेद: अणु (अविभाज्य शुद्ध परमाणु) और स्कन्ध (परमाणुओं का समूह)। इसके छह भेद हैं: बादर-बादर, बादर, बादर-सूक्ष्म, सूक्ष्म-बादर, सूक्ष्म और सूक्ष्म-सूक्ष्म।

उपकार: शरीर, मन, वचन, श्वास, सुख, दुःख, जीवन और मरण पुद्गल के उपकार हैं।

३-४

धर्म एवं अधर्म द्रव्य

अमूर्तिक • गति-स्थिति सहायक

धर्म द्रव्य: गतिशील जीव और पुद्गल को चलने में जल की तरह उदासीन सहायक कारण बनना।

अधर्म द्रव्य: रुकने वाले जीव और पुद्गल को छायादार वृक्ष की तरह ठहरने में सहायक होना।

उदासीनता: यह दोनों द्रव्य किसी को जबरन चलाते या रोकते नहीं, केवल इच्छुक को सहारा देते हैं।

५-६

आकाश एवं काल द्रव्य

अवकाशदान • वर्तना

आकाश द्रव्य: सभी द्रव्यों को स्थान (अवकाश) देना इसका कार्य है। लोकाकाश में छहों द्रव्य रहते हैं और अलोकाकाश अनंत है।

काल द्रव्य: जो द्रव्यों के नए से पुराने होने और अवस्था परिवर्तन में कील की तरह सहायक होता है।

जीव और अजीव के संयोग से सप्ततत्त्व मीमांसा

संसार में जीव और कर्म के संबंध से आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा एवं मोक्ष की प्रक्रिया घटित होती है।

१. आस्रव तत्त्व (Inflow of Karma)

मन, वचन, काय की क्रिया और राग-द्वेष के कारण कर्म पुद्गल का आत्मा की ओर आना आस्रव कहलाता है। जैसे समुद्र में चलती हुई नाव में पानी आने के लिए खुला हुआ छिद्र होना।
आस्रव तत्त्व

२. बंध तत्त्व (Bondage of Karma)

आत्मा के प्रदेशों के साथ आए हुए कर्मों का दूध और पानी की तरह संश्लेष हो जाना बंध कहलाता है। जैसे नाव में पानी भरकर उसका भारी हो जाना।
बंध तत्त्व

३. संवर तत्त्व (Stoppage of Karma)

संयम, गुप्ति, समिति और सम्यक् आचरण से नए कर्मों का आना रोक देना संवर है। जैसे नाव के छिद्र को डाट या कपड़े से बंद कर देना ताकि नया पानी न आ सके।
संवर तत्त्व

४. निर्जरा तत्त्व (Shedding of Karma)

तप और ध्यान के द्वारा आत्मा से पूर्व में बंधे हुए कर्मों को एकदेश रूप से पृथक् करना (झाड़ना) निर्जरा है। जैसे नाव में भरे पानी को उलीच कर बाहर फेंकना।
निर्जरा तत्त्व

५. मोक्ष तत्त्व (Liberation)

आत्मा से समस्त कर्म-मल का सर्वथा आत्यंतिक नाश हो जाना और सिद्धशिला पर अनंत काल के लिए प्रतिष्ठित हो जाना मोक्ष है। जैसे नाव का सकुशल किनारे पहुँच जाना।
मोक्ष तत्त्व

छह द्रव्यों की संख्या, प्रदेश एवं अस्तिकाय तालिका

द्रव्य संख्या प्रदेश अस्तिकाय रूप
जीव अनन्तानन्त असंख्यात प्रदेशी अस्तिकाय अमूर्तिक
पुद्गल अनन्तानन्त संख्यात, असंख्यात, अनन्त अस्तिकाय मूर्तिक
धर्म एक असंख्यात प्रदेशी अस्तिकाय अमूर्तिक
अधर्म एक असंख्यात प्रदेशी अस्तिकाय अमूर्तिक
आकाश एक अनन्त प्रदेशी अस्तिकाय अमूर्तिक
काल असंख्यात एक प्रदेशी अनस्तिकाय अमूर्तिक
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