जैनामृत गुणस्थान शिविर Day-3 रामपुर मनिहारन, (सहारनपुर )

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04 Nov 2026 Admin
गुणस्थान अध्ययन — आज की संपूर्ण कक्षा

गुणस्थान अध्ययन — आज की संपूर्ण कक्षा

1. गुणस्थान का शाब्दिक अर्थ

गुणस्थान = गुण + स्थान

  • गुण: परिणाम अथवा भाव।
  • स्थान: जगह अथवा अवस्था।

इस प्रकार गुणस्थान का शाब्दिक अर्थ परिणामस्थान अथवा भावस्थान समझा जाता है। जीव के परिणामों में समय-समय पर परिवर्तन होते रहते हैं। इन्हीं परिणामों की विभिन्न अवस्थाओं के आधार पर जीव की स्थिति को समझने के लिए गुणस्थानों का वर्णन किया गया है।

गुणस्थान का अध्ययन हमें यह समझने में सहायता करता है कि जीव की आंतरिक अवस्था कैसी है और वह किस स्थिति में है।

2. गुणस्थान किसे कहते हैं?

मोह और योग के निमित्त से जीव के अंतरंग परिणामों में प्रतिक्षण होने वाले उतार-चढ़ाव का नाम गुणस्थान है।

इस परिभाषा को समझने के लिए इसके मुख्य शब्दों को जानना आवश्यक है:

  • मोह: यहाँ मोह से आशय मोहनीय कर्म से है।
  • योग: मन, वचन और काय की चंचलता अथवा प्रवृत्ति को योग कहते हैं।
  • निमित्त: जिसके निमित्त से कोई कार्य अथवा परिवर्तन होता है।
  • अंतरंग परिणाम: जीव के भीतर होने वाले भाव अथवा परिणाम।
  • प्रतिक्षण: प्रत्येक क्षण।
  • उतार-चढ़ाव: परिणामों में होने वाला परिवर्तन।

इस प्रकार जीव के परिणामों में होने वाले परिवर्तन और उनकी विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन गुणस्थान के माध्यम से किया जाता है।

3. गुणस्थान में परिणामों का उतार-चढ़ाव

जीव के परिणाम हमेशा एक जैसे नहीं रहते, उनमें निरंतर परिवर्तन होता रहता है। कभी जीव के परिणाम अशुद्ध होते हैं, तो कभी उनमें शुद्धता की वृद्धि होती है। मोहनीय कर्म के प्रभाव और योग के निमित्त से जीव के अंतरंग परिणामों में परिवर्तन होता है।

ध्यान रखने योग्य बात: गुणस्थान जीव के परिणामों की अवस्था को समझने का विषय है। यह केवल बाहरी व्यवहार अथवा शरीर की अवस्था का नाम नहीं है।

4. मोहनीय कर्म का परिचय

मोहनीय कर्म आठ कर्मों में से एक प्रमुख कर्म है। इसका संबंध जीव के मोह और उसके परिणामों से है। यह जीव के सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्र से संबंधित परिणामों को प्रभावित करता है।

जब तक मोहनीय कर्म का प्रभाव बना रहता है, तब तक जीव के लिए सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्र की पूर्ण अवस्था प्राप्त करना बाधित रहता है।

5. मोहनीय कर्म के दो भेद

मोहनीय कर्म के दो मुख्य भेद बताए गए हैं:

  1. दर्शन मोहनीय कर्म
  2. चारित्र मोहनीय कर्म

इन दोनों का प्रभाव अलग-अलग रूप से समझना चाहिए।

6. दर्शन मोहनीय कर्म का प्रभाव

दर्शन मोहनीय कर्म जीव के सम्यग्दर्शन को प्रभावित करता है। सम्यग्दर्शन का अर्थ है — वीतरागी देव, निर्ग्रन्थ दिगंबर जैन गुरु, माँ जिनवाणी और उनके द्वारा बताये गए सात तत्त्वों के प्रति यथार्थ श्रद्धान। दर्शन मोहनीय कर्म के प्रभाव से जीव को तत्त्वों का सही श्रद्धान प्राप्त नहीं हो पाता अथवा उसका सम्यग्दर्शन बाधित होता है।

मिथ्यात्व: तत्त्वों के प्रति विपरीत श्रद्धान अथवा गलत मान्यता रखना मिथ्यात्व कहलाता है। ध्यान रखें कि मिथ्यात्व दर्शन मोहनीय कर्म की ही एक प्रकृति है। दर्शन मोहनीय कर्म के अंतर्गत केवल मिथ्यात्व ही नहीं, अन्य प्रकृतियाँ भी आती हैं।

मुख्य बात: दर्शन मोहनीय कर्म सम्यग्दर्शन को प्रभावित करता है।

7. चारित्र मोहनीय कर्म का प्रभाव

चारित्र मोहनीय कर्म जीव के चारित्र को प्रभावित करता है। जीव के परिणामों में राग और द्वेष जैसे विकारों का संबंध चारित्र मोहनीय कर्म से समझाया जाता है।

  • राग: किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति आसक्ति अथवा अनुराग का भाव।
  • द्वेष: किसी के प्रति विरोध अथवा अप्रियता का भाव।
  • वीतरागता: राग और द्वेष से रहित अवस्था।

चारित्र मोहनीय कर्म के प्रभाव के कारण जीव सम्यक् चारित्र को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर पाता। जब तक राग-द्वेष आदि कषायों का प्रभाव बना रहता है, तब तक पूर्ण वीतरागता/ स्वरूपाचरण चारित्र की अवस्था प्राप्त नहीं होती।

मुख्य बात: चारित्र मोहनीय कर्म सम्यक् चारित्र को प्रभावित करता है।

8. दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय में अंतर

आधार दर्शन मोहनीय चारित्र मोहनीय
मुख्य प्रभाव सम्यग्दर्शन को प्रभावित करता है सम्यक् चारित्र को प्रभावित करता है
संबंधित विषय श्रद्धान आचरण और चारित्र
मुख्य बाधा यथार्थ श्रद्धान में बाधा वीतराग चारित्र/ स्वरूपाचरण चारित्र में बाधा
उदाहरण मिथ्यात्व राग-द्वेष और कषाय
याद रखने का सरल तरीका:
• दर्शन मोहनीय — सम्यग्दर्शन में बाधा।
• चारित्र मोहनीय — सम्यक् चारित्र में बाधा।

9. योग किसे कहते हैं?

मन, वचन और काय की चंचलता अथवा प्रवृत्ति को योग कहते हैं। जीव की मन, वचन और शरीर संबंधी गतिविधियों को योग के अंतर्गत समझा जाता है।

10. योग के तीन भेद

  1. मन योग: मन की गतिविधि अथवा चंचलता को मन योग कहते हैं।
  2. वचन योग: वचन अर्थात् बोलने से संबंधित गतिविधि को वचन योग कहते हैं।
  3. काय योग: शरीर की गतिविधि अथवा चंचलता को काय योग कहते हैं।

उदाहरण से समझिए:

  • जब हम मन में किसी विषय के बारे में विचार करते हैं, तब मन योग का उदाहरण समझ सकते हैं।
  • जब हम बोलते हैं, तब वचन योग का उदाहरण समझ सकते हैं।
  • जब हम हाथ-पैर अथवा शरीर को हिलाते-डुलाते हैं, तब काय योग का उदाहरण समझ सकते हैं।
याद रखने योग्य सूत्र: योग के तीन भेद — मन योग, वचन योग और काय योग।

11. मन का स्वरूप — जैन दर्शन के अनुसार

सामान्य बातचीत में हम मन को अंग्रेजी के शब्द Mind अथवा मस्तिष्क से जोड़कर समझ लेते हैं, लेकिन जैन दर्शन में मन का विषय अलग सिद्धांतिक दृष्टि से समझाया जाता है। मन मस्तिष्क है ऐसा नहीं मानना चाहिए; जैन दर्शन में इसके स्वरूप का विशिष्ट विवेचन है। मन बहुत ही सूक्ष्म कमलाकार और हृदय के निकट स्थित है, उस मन के द्वारा ही जीव अपने हित अहित के बारे में विचार कर पाता है।

शिक्षण संबंधी टिप्पणी: मन के हृदय के निकट स्थित होने अथवा उसके सूक्ष्म स्वरूप के बारे में जो विशेष व्याख्या कक्षा में बताई गई थी, उसकी शास्त्रीय शब्दावली और संदर्भ संबंधित मूल ग्रंथ से मिलाकर ही आगे विस्तार से लिखें।

12. चौदह गुणस्थानों के नाम

जैन दर्शन में गुणस्थान चौदह बताए गए हैं। इनके नाम क्रम से याद करना आवश्यक है:

  • 1. मिथ्यात्व
  • 2. सासादन
  • 3. मिश्र
  • 4. अविरत सम्यग्दृष्टि
  • 5. देशविरत
  • 6. प्रमत्तसंयत
  • 7. अप्रमत्तसंयत
  • 8. अपूर्वकरण
  • 9. अनिवृत्तिकरण
  • 10. सूक्ष्मसांपराय
  • 11. उपशान्तकषाय
  • 12. क्षीणमोह
  • 13. सयोगी केवलि
  • 14. अयोगी केवलि

चौदह गुणस्थानों को याद करने का अभ्यास: इन चौदह नामों को सही क्रम में बोलने और लिखने का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। इनकी अलग-अलग विस्तृत परिभाषाएँ आगामी कक्षाओं में समझाई जाएँगी।

आज की कक्षा का संक्षिप्त पुनरावर्तन

  1. गुणस्थान का शाब्दिक अर्थ परिणामस्थान अथवा भावस्थान है।
  2. गुण का अर्थ परिणाम अथवा भाव है।
  3. स्थान का अर्थ जगह अथवा अवस्था है।
  4. गुणस्थान की परिभाषा में मोह और योग निमित्त हैं।
  5. मोहनीय कर्म के दो मुख्य भेद हैं।
  6. दर्शन मोहनीय कर्म सम्यग्दर्शन को प्रभावित करता है।
  7. चारित्र मोहनीय कर्म सम्यक् चारित्र को प्रभावित करता है।
  8. मिथ्यात्व दर्शन मोहनीय कर्म की एक प्रकृति है।
  9. राग-द्वेष चारित्र मोहनीय कर्म के प्रभाव से संबंधित हैं।
  10. योग मन, वचन और काय की चंचलता अथवा प्रवृत्ति है।
  11. योग के तीन भेद हैं — मन योग, वचन योग और काय योग।
  12. गुणस्थान कुल चौदह हैं।

अभ्यास प्रश्नावली — 30 बहुविकल्पीय प्रश्न

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न में तीन विकल्प दिए गए हैं। सही विकल्प का चयन कीजिए।

प्रश्न 1. गुणस्थान का शाब्दिक अर्थ क्या है?
  • (A) शरीरस्थान
  • (B) परिणामस्थान अथवा भावस्थान
  • (C) कर्मस्थान
प्रश्न 2. गुण का अर्थ क्या है?
  • (A) परिणाम अथवा भाव
  • (B) शरीर
  • (C) स्थान
प्रश्न 3. स्थान का अर्थ क्या है?
  • (A) कर्म
  • (B) जगह अथवा अवस्था
  • (C) राग
प्रश्न 4. गुणस्थान की परिभाषा में किनके निमित्त से परिणामों में उतार-चढ़ाव बताया गया है?
  • (A) मोह और योग
  • (B) शरीर और भोजन
  • (C) धन और परिवार
प्रश्न 5. गुणस्थान किसके अंतरंग परिणामों से संबंधित है?
  • (A) शरीर के
  • (B) जीव के
  • (C) घर के
प्रश्न 6. गुणस्थान की परिभाषा में 'प्रतिक्षण' का क्या अर्थ है?
  • (A) प्रत्येक क्षण
  • (B) प्रत्येक वर्ष
  • (C) केवल एक बार
प्रश्न 7. मोहनीय कर्म के कितने मुख्य भेद हैं?
  • (A) दो
  • (B) तीन
  • (C) चार
प्रश्न 8. मोहनीय कर्म का पहला मुख्य भेद कौन-सा है?
  • (A) ज्ञानावरण
  • (B) दर्शन मोहनीय
  • (C) आयु कर्म
प्रश्न 9. मोहनीय कर्म का दूसरा मुख्य भेद कौन-सा है?
  • (A) चारित्र मोहनीय
  • (B) नाम कर्म
  • (C) वेदनीय कर्म
प्रश्न 10. दर्शन मोहनीय कर्म किसे प्रभावित करता है?
  • (A) सम्यग्दर्शन
  • (B) शरीर
  • (C) आयु
प्रश्न 11. चारित्र मोहनीय कर्म किसे प्रभावित करता है?
  • (A) सम्यक् चारित्र
  • (B) शरीर की लंबाई
  • (C) आयु
प्रश्न 12. मिथ्यात्व किस कर्म की एक प्रकृति है?
  • (A) दर्शन मोहनीय
  • (B) ज्ञानावरण
  • (C) आयु कर्म
प्रश्न 13. मिथ्यात्व का संबंध किससे है?
  • (A) विपरीत श्रद्धान
  • (B) शरीर की गति
  • (C) भोजन
प्रश्न 14. राग और द्वेष का संबंध मुख्य रूप से किससे समझाया जाता है?
  • (A) चारित्र मोहनीय कर्म
  • (B) आयु कर्म
  • (C) नाम कर्म
प्रश्न 15. वीतरागता का अर्थ क्या है?
  • (A) राग-द्वेष से रहित अवस्था
  • (B) अधिक बोलना
  • (C) अधिक चलना
प्रश्न 16. दर्शन मोहनीय कर्म किसमें बाधा पहुँचाता है?
  • (A) सम्यग्दर्शन
  • (B) शरीर
  • (C) निद्रा
प्रश्न 17. चारित्र मोहनीय कर्म किसमें बाधा पहुँचाता है?
  • (A) सम्यक् चारित्र
  • (B) आयु
  • (C) शरीर का रंग
प्रश्न 18. योग किसे कहते हैं?
  • (A) मन, वचन और काय की चंचलता अथवा प्रवृत्ति
  • (B) केवल चलने को
  • (C) केवल बोलने को
प्रश्न 19. योग के कितने भेद हैं?
  • (A) दो
  • (B) तीन
  • (C) चार
प्रश्न 20. योग का पहला भेद कौन-सा है?
  • (A) मन योग
  • (B) काय योग
  • (C) वचन योग
प्रश्न 21. योग का दूसरा भेद कौन-सा है?
  • (A) काय योग
  • (B) वचन योग
  • (C) मन योग
प्रश्न 22. योग का तीसरा भेद कौन-सा है?
  • (A) मन योग
  • (B) वचन योग
  • (C) काय योग
प्रश्न 23. मन में विचार करने से संबंधित योग कौन-सा है?
  • (A) मन योग
  • (B) वचन योग
  • (C) काय योग
प्रश्न 24. बोलने से संबंधित योग कौन-सा है?
  • (A) काय योग
  • (B) वचन योग
  • (C) मन योग
प्रश्न 25. शरीर की गतिविधि से संबंधित योग कौन-सा है?
  • (A) मन योग
  • (B) वचन योग
  • (C) काय योग
प्रश्न 26. जैन दर्शन में गुणस्थान कितने बताए गए हैं?
  • (A) 12
  • (B) 14
  • (C) 16
प्रश्न 27. प्रथम गुणस्थान का नाम क्या है?
  • (A) मिथ्यात्व
  • (B) मिश्र
  • (C) सासादन
प्रश्न 28. चौथे गुणस्थान का नाम क्या है?
  • (A) देशविरत
  • (B) अविरत सम्यग्दृष्टि
  • (C) प्रमत्तसंयत
प्रश्न 29. तेरहवें गुणस्थान का नाम क्या है?
  • (A) क्षीणमोह
  • (B) अयोगी केवलि
  • (C) सयोगी केवलि
प्रश्न 30. चौदहवें गुणस्थान का नाम क्या है?
  • (A) उपशान्तकषाय
  • (B) अयोगी केवलि
  • (C) सयोगी केवलि

विद्यार्थियों के लिए संदेश

बच्चों! आज हमने गुणस्थान के शाब्दिक अर्थ, गुणस्थान की परिभाषा, मोहनीय कर्म के दो भेद, दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय कर्म के प्रभाव तथा योग के तीन भेदों का अध्ययन किया। इसके साथ ही हमने चौदह गुणस्थानों के नाम क्रम से याद किए।

आप सभी इन विषयों को ध्यानपूर्वक दोहराएँ और ऊपर दिए गए 30 प्रश्नों को हल करके अपना अभ्यास पूरा करें। अगली कक्षा में हम गुणस्थान के विषय को और अधिक विस्तार से समझेंगे।

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