जिनागम में कल्की एवं उपकल्की राजा
अवसर्पिणी पंचम दुषम काल, 21 कल्की-उपकल्की विधान, धर्म-ह्रास एवं अंतिम विच्छेद का प्रामाणिक निरूपण
✦ 1. पंचम काल एवं कल्की विधान का स्वरूप
चरम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष पधारने के 3 वर्ष, 8 माह और 15 दिन पश्चात् अवसर्पिणी काल का पंचम दुषम काल प्रारंभ हुआ। इस काल की कुल मर्यादा 21,000 वर्ष प्रमाण है।
जैसे-जैसे काल आगे बढ़ता है, जीवों की आयु, अवगाहना (ऊंचाई), आत्मिक बल और धर्म-निष्ठा का निरंतर ह्रास होता है। इस काल में धर्म पर आघात करने वाले शासक उत्पन्न होते हैं:
- कल्की (कलंकी) राजा: प्रत्येक 1,000 वर्ष के अंतराल पर एक अत्यंत पापी व धर्मद्रोही कल्की उत्पन्न होता है (कुल 21 कल्की)।
- उपकल्की राजा: प्रत्येक कल्की के 500 वर्ष बाद धर्म को आघात करने वाला एक उपकल्की उत्पन्न होता है (कुल 21 उपकल्की)।
- अवधिज्ञानी मुनिराज: प्रत्येक कल्की के शासनकाल में जब मुनिराज के आहार पर संकट आता है, तब एक दिगंबर मुनिराज को अवधिज्ञान उत्पन्न होता है (कुल 21 मुनिराज)।
संपूर्ण पंचम काल में कुल 21 कल्की, 21 उपकल्की राजा और 21 अवधिज्ञानी मुनिराज होते हैं। अंतिम कल्की के वध के साथ ही भरत क्षेत्र से मुनिमार्ग का पूर्ण विच्छेद हो जाता है।
✦ 2. प्रथम कल्की (चतुर्मुख कल्की) का चरित्र
भगवान महावीर के निर्वाण के 1,000 वर्ष पूर्ण होने पर पाटलिपुत्र नगर में राजा शिशुपाल और रानी पृथिवीसुंदरी के यहाँ चतुर्मुख कल्की का जन्म हुआ। इसकी कुल आयु 70 वर्ष एवं राज्यकाल 42 वर्ष रहा।
चतुर्मुख कल्की अत्यंत लोभी और जिनधर्म का द्रोही हुआ। उसने दिगंबर संतों के आहार पर भी शुल्क (कर) लगाने का दुस्साहस किया।
घटित प्रसंग एवं असुर देव द्वारा दंड:
- आहार में कर की मांग: कल्की के आदेश पर मंत्री ने आहारचर्या के समय दिगंबर मुनिराज से पहला ग्रास शुल्क के रूप में माँगा।
- अंतराय एवं अवधिज्ञान: मुनिराज ने आहार में शुल्क मांगे जाने को भारी अंतराय जानकर प्रथम ग्रास दे दिया और निराहार वन लौट गए। उसी क्षण मुनिराज को विशुद्ध अवधिज्ञान प्रकट हुआ।
- असुर देव द्वारा वध: एक सम्यग्दृष्टि असुर देव ने अवधिज्ञान से यह अधर्म देखकर वज्र प्रहार से पापी कल्की का वध कर दिया। वह मरकर पहली नरक भूमि (रत्नप्रभा) में एक सागरोपम की आयु लेकर उत्पन्न हुआ।
- अजितंजय का अभयदान: कल्की के पुत्र अजितंजय ने देव के चरणों में क्षमा मांगी। देव ने उसे "धर्मपूर्वक न्याय से राज्य करो" का उपदेश देकर अभय किया, जिससे प्रजा में पुनः धर्म की वृद्धि हुई।
✦ 3. इक्कीस कल्की एवं उपकल्की की संपूर्ण समय-सारणी
वीर निर्वाण संवत् (527 ईसा पूर्व) के आधार पर 21,000 वर्ष के पंचम काल में कल्की राजाओं का प्रादुर्भाव चक्र। वर्तमान समय (2026 ईस्वी = वीर निर्वाण संवत् 2553) के अनुसार अब तक 2 कल्की और 2 उपकल्की व्यतीत हो चुके हैं:
| क्र. सं. | शासक का पद | वीर निर्वाण संवत् (VNS) | अनुमानित ईस्वी सन (CE) | काल-स्थिति (वर्तमान सापेक्ष) |
|---|---|---|---|---|
| 1 | प्रथम कल्की (चतुर्मुख कल्की) | 1,000 वर्ष | 473 – 500 ई. | व्यतीत |
| — | प्रथम उपकल्की | 1,500 वर्ष | 973 ई. | व्यतीत |
| 2 | द्वितीय कल्की | 2,000 वर्ष | 1473 ई. | व्यतीत |
| — | द्वितीय उपकल्की | 2,500 वर्ष | 1973 ई. | व्यतीत |
| ★ | वर्तमान कालखंड | 2,553 वर्ष | 2026 ई. | वर्तमान समय |
| 3 | तृतीय कल्की | 3,000 वर्ष | 2473 ई. | आगामी (~447 वर्ष बाद) |
| — | तृतीय उपकल्की | 3,500 वर्ष | 2973 ई. | आगामी |
| 4 | चतुर्थ कल्की | 4,000 वर्ष | 3473 ई. | आगामी |
| — | चतुर्थ उपकल्की | 4,500 वर्ष | 3973 ई. | आगामी |
| 5 | पंचम कल्की | 5,000 वर्ष | 4473 ई. | आगामी |
| — | पंचम उपकल्की | 5,500 वर्ष | 4973 ई. | आगामी |
| 6 | षष्ठ कल्की | 6,000 वर्ष | 5473 ई. | आगामी |
| — | षष्ठ उपकल्की | 6,500 वर्ष | 5973 ई. | आगामी |
| 7 | सप्तम कल्की | 7,000 वर्ष | 6473 ई. | आगामी |
| — | सप्तम उपकल्की | 7,500 वर्ष | 6973 ई. | आगामी |
| 8 | अष्टम कल्की | 8,000 वर्ष | 7473 ई. | आगामी |
| — | अष्टम उपकल्की | 8,500 वर्ष | 7973 ई. | आगामी |
| 9 | नवम कल्की | 9,000 वर्ष | 8473 ई. | आगामी |
| — | नवम उपकल्की | 9,500 वर्ष | 8973 ई. | आगामी |
| 10 | दशम कल्की | 10,000 वर्ष | 9473 ई. | आगामी |
| — | दशम उपकल्की | 10,500 वर्ष | 9973 ई. | आगामी |
| 11 | एकादश कल्की | 11,000 वर्ष | 10473 ई. | आगामी |
| — | एकादश उपकल्की | 11,500 वर्ष | 10973 ई. | आगामी |
| 12 | द्वादश कल्की | 12,000 वर्ष | 11473 ई. | आगामी |
| — | द्वादश उपकल्की | 12,500 वर्ष | 11973 ई. | आगामी |
| 13 | त्रयोदश कल्की | 13,000 वर्ष | 12473 ई. | आगामी |
| — | त्रयोदश उपकल्की | 13,500 वर्ष | 12973 ई. | आगामी |
| 14 | चतुर्दश कल्की | 14,000 वर्ष | 13473 ई. | आगामी |
| — | चतुर्दश उपकल्की | 14,500 वर्ष | 13973 ई. | आगामी |
| 15 | पंचदश कल्की | 15,000 वर्ष | 14473 ई. | आगामी |
| — | पंचदश उपकल्की | 15,500 वर्ष | 14973 ई. | आगामी |
| 16 | षोडश कल्की | 16,000 वर्ष | 15473 ई. | आगामी |
| — | षोडश उपकल्की | 16,500 वर्ष | 15973 ई. | आगामी |
| 17 | सप्तदश कल्की | 17,000 वर्ष | 16473 ई. | आगामी |
| — | सप्तदश उपकल्की | 17,500 वर्ष | 16973 ई. | आगामी |
| 18 | अष्टादश कल्की | 18,000 वर्ष | 17473 ई. | आगामी |
| — | अष्टादश उपकल्की | 18,500 वर्ष | 17973 ई. | आगामी |
| 19 | एकोनविंश कल्की | 19,000 वर्ष | 18473 ई. | आगामी |
| — | एकोनविंश उपकल्की | 19,500 वर्ष | 18973 ई. | आगामी |
| 20 | विंशतितम कल्की | 20,000 वर्ष | 19473 ई. | आगामी |
| — | विंशतितम उपकल्की | 20,500 वर्ष | 19973 ई. | आगामी |
| 21 | अंतिम कल्की (जलमंथन कल्की) | 20,996 वर्ष | ~20,469 ई. | धर्म विच्छेद (काल अंत) |
✦ 4. इक्कीसवाँ कल्की (जलमंथन) एवं मुनिमार्ग का अवसान
पंचम काल के पूर्ण होने से ठीक 3 वर्ष, 8 माह और 15 दिन पूर्व 21वाँ कल्की जलमंथन उत्पन्न होगा। उस समय इस संपूर्ण भरत क्षेत्र में मात्र चार अंतिम संयमी जीव शेष रहेंगे:
कार्तिक कृष्ण अमावस्या — अंतिम दिन का घटनाक्रम:
- प्रातःकाल: कल्की जलमंथन के आदेश पर मुनिराज वीरांगद जी से आहार का पहला ग्रास माँगा जाता है। मुनिराज अंतराय मानकर लौट आते हैं और उन्हें अवधिज्ञान होता है।
- सल्लेखना संन्यास: मुनिराज शेष तीनों जनों को बताते हैं कि पंचम काल का अंत आ चुका है और सबकी मात्र 3 दिन की आयु शेष है। चारों पुण्यात्मा सर्व परिग्रह और आहार का त्याग कर संन्यास अंगीकार करते हैं।
- स्वर्ग गमन: कार्तिक कृष्ण अमावस्या को स्वाति नक्षत्र में चारों पुण्यात्मा समाधिमरण पूर्वक देह त्यागकर सौधर्म स्वर्ग में देव रूप में उत्पन्न होते हैं।
- मध्याह्न काल: असुरकुमार देव (चमरेन्द्र) कुपित होकर जलमंथन कल्की को समाप्त कर देता है, और वह सीधे पहली नरक भूमि में जाता है।
- अपराह्न काल: सूर्यास्त होते-होते पृथ्वी से प्राकृतिक अग्नि, मुनिमार्ग और जिनधर्म का पूर्ण विच्छेद हो जाता है। इसके बाद अति-दुषम (छठा काल) प्रारंभ होता है।