गुणस्थान एवं दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृतियाँ
1. गुणस्थान: व्युत्पत्ति एवं आगम लक्षण
जैन दर्शन में आत्मा के विकारी अथवा अविकारी परिणामों की क्रमिक तारतम्यता को गुणस्थान संज्ञा दी गई है।
- गुण: आत्मा के परिणाम अथवा भाव।
- स्थान: आत्मा के उन परिणामों की विशेष अवस्था अथवा मर्यादा।
गुणस्थानों की कुल संख्या 14 है। यह व्यवस्था केवल संसारी जीवों की आत्मिक अवस्थाओं के विश्लेषण हेतु है। कर्म-बंधनों से सर्वथा विमुक्त सिद्ध भगवान चौदहवें गुणस्थान से भी अतीत होकर गुणातीत (गुणस्थान-रहित) होते हैं।
2. मोहनीय कर्म एवं उसके प्रमुख भेद
आठ कर्मों में जीव के सम्यक्त्व और चारित्र को आच्छादित करने वाला सर्वप्रमुख कर्म मोहनीय कर्म है। इसके दो मुख्य भेद हैं:
- दर्शन मोहनीय: जो जीव के श्रद्धान गुण (सम्यग्दर्शन) का घात करता है।
- चारित्र मोहनीय: जो जीव के रमणता रूप आचरण (सम्यक्चारित्र) का घात करता है।
दर्शन मोहनीय कर्म की सत्ता और उदय के आधार पर इसे तीन प्रकृतियों में विभक्त किया गया है:
- मिथ्यात्व प्रकृति
- सम्यग्मिथ्यात्व (मिश्र) प्रकृति
- सम्यक्त्व (वेदक) प्रकृति
3. तीन प्रकृतियों का स्वरूप एवं देव-शास्त्र-गुरु की पहचान
(क) मिथ्यात्व प्रकृति:
इस कर्म के उदय से जीव को सच्चे तत्व पर श्रद्धान नहीं होता। जीव वीतरागी मार्ग के स्थान पर राग-द्वेष रूप भावों और कुमार्ग को सत्य मानता है। दिगंबर जैन सिद्धांत के अनुसार मिथ्यात्व से बचने हेतु सच्चे और असत्य (कु) के विवेक का ज्ञान अनिवार्य है:
| तत्व | सच्चा स्वरूप (उपादेय) | मिथ्या रूप (हेय / त्याज्य) |
|---|---|---|
| देव | सच्चे देव: सर्वज्ञ, वीतरागी एवं हितोपदेशी जिनेन्द्र भगवान। | कुदेव: राग, द्वेष, काम, क्रोध एवं अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले देवता। |
| गुरु | सच्चे गुरु: परिग्रह-रहित, 28 मूलगुणों के धारक दिगंबर निर्ग्रंथ मुनिराज। | कुगुरु: बाह्य वेश-भूषा, आडंबर, मायाचार युक्त और आरंभी-परिग्रही भेषधारी। |
| शास्त्र | सच्चे शास्त्र: वीतराग वाणी, पूर्वापर दोषरहित जिनवाणी। | कुशास्त्र: वीतराग मार्ग के प्रतिकूल, हिंसा व राग-द्वेष को पुष्ट करने वाले ग्रंथ। |
(ख) सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति (मिश्र भाव):
इस प्रकृति के उदय में जीव के भाव न तो पूर्णतः सम्यक् होते हैं और न ही पूर्णतः मिथ्या; अपितु दोनों का मिश्रित रूप (जैसे गुड़ और दही का मिश्रित स्वाद) रहता है। इस अवस्था में जीव को न सच्चा श्रद्धान होता है और न ही एकांत कुश्रद्धान।
(ग) सम्यक्त्व प्रकृति एवं चल-मल-अगार दोष:
क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि जीव के सम्यक्त्व प्रकृति का उदय रहता है। इसका उदय काल अंतर्मुहूर्त (अत्यल्प काल, जैसे पलक झपकने की उपमा) होता है। यद्यपि इससे सम्यक्त्व का पूर्ण घात नहीं होता, तथापि श्रद्धान में चल, मल और अगार दोष उत्पन्न होते हैं:
- चल दोष: श्रद्धान में चंचलता आना।
- मल दोष: दोषों का आंशिक मलिन प्रभाव होना।
- अगार दोष: सीमित संकुचित ममत्व अथवा पक्षपात का भाव, जैसे— "यह मंदिर हमारा है, वह समाज का है" अथवा "केवल अमुक तीर्थंकर ही हमारे विशिष्ट रक्षक हैं।"